सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६२ ) संबंध होता है, सम्बन्ध रहित के प्रकाश करने में उनकी शक्ति नहीं है। यदि इन्द्रियों में यह शक्ति होती कि बिना सम्बन्ध वाले पदार्थ को भी प्रकाश कर दिया करतीं तो देशान्तर के पदार्थ का भी प्रकाश करना कुछ मुश्किल न होता। और जब दूसरी जगह रक्खे हुए पदार्थों का नेत्र आदि इन्द्रियों को ज्ञान हो जाया करता कि वह वस्तु अमुक स्थान में रक्खी है तो उनको सर्वज्ञता प्राप्त हो सकती है ; इसलिये ईश्वर और इन्द्रियों में कुछ भेद नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वर भी सर्वज्ञ है और इन्द्रियाँ भी सर्वज्ञ हैं, ऐसा ही कहने में आवेगा। इस कारण यही बात माननी ठीक है कि नेत्र आदि इन्द्रियाँ उस वस्तु का ही प्रकाश कर सकती हैं जो उनको दीखती हैं। प्र०—अपसर्पण ( फैलाना ) तेज का धर्म है और तेज पदार्थ का प्रकाश करता है। इसी तरह नेत्र को भी तेजस्वरूप मानना चाहिये ; क्योंकि वह नेत्र भी पदार्थ का प्रकाश करता है। उ०—न तेजोऽपसर्पणात् तैजसं चक्षुर्वृत्ति- तस्तत्सिद्धेः ॥ १०५ ॥ अर्थ—निस्सन्देह तेज में फैलने की शक्ति है, परन्तु इससे चक्षु ( आँख ) को तेजस्वरूप नहीं कह सकते ; क्योंकि जिस बात के सिद्ध करने के लिये नेत्र को तेजस्वरूप मानने की ज़रूरत है वह बात इस रीति से भी सिद्ध हो सकती है कि जो नेत्र की वृत्ति है ( जिससे कि पदार्थ का प्रत्यक्ष होता है ) उसी से पदार्थ का प्रत्यक्ष माना जाय। प्राप्तार्थप्रकाशलिंगात् वृत्तिसिद्धिः ॥ १०६ ॥ अर्थ—नेत्र का जिस पदार्थ से संबंध होता है उसको ही