भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १६३ ) प्रकाश करता है, इससे साफ़-साफ़ सिद्ध होता है कि चक्षु की वृत्ति तेजस्वरूप है नेत्र तेजस्वरूप नहीं हैं। प्र०-जब नेत्र का पदार्थ से संबंध होता है तब नेत्र की वृत्ति शरीर को बिना छोड़े उस पदार्थ पर कैसे जा पड़ती है ? उ०-भागगुणाभ्यां तत्वान्तरं वृत्तिः सस्बं- धार्थ सर्पतीति ॥ १०७ ॥ अर्थ-नेत्र आदि की वृत्ति पदार्थ के सम्बन्ध के वास्ते जाती है, इससे नेत्र का ( भाग ) टुकड़ा वा रूप आदि गुण वृत्ति नहीं हैं; किंतु भाग और गुण इन दोनों से भिन्न ( जुदा ) एक तीसरे पदार्थ का नाम वृत्ति है; क्योंकि यदि चक्षु आदि के भाग का नाम वृत्ति होता तो एक-एक पदार्थ का एक-एक वार नेत्र से सम्बन्ध होने पर सहज-सहज नेत्र के टुकड़े होकर उसका नाश हो जाना योग्य था, और यदि गुण का हो नाम वृत्ति होता तो गुण जड़ होते हैं, इस वास्ते वृत्ति का पदार्थ के साथ सम्बन्ध होते ही पदार्थ में चला जाना नहीं हो सकता था ! अतः भाग और गुण इन दोनों से वृत्ति भिन्न एक पदार्थ है। प्र०-ऐसे लक्षणों के करने से वृत्ति एक द्रव्य सिद्ध होता है तब इच्छा आदि जो बुद्धि के गुण हैं उनको वृत्ति क्यों माना है ? क्योंकि गुणों का नाम वृत्ति नहीं हो सकता । उ०-न द्रव्यनियमस्तद्योगात् ॥ १०८ ॥ अर्थ-वृत्ति द्रव्य ही है, यह नियम नहीं; क्योंकि अनेक वाक्यों में ऐसे विषय पर भी वृत्ति शब्द का व्यवहार देखने में आता है जहाँ पर द्रव्य का अर्थ नहीं हो सकता ; जैसे-वैश्य वृत्ति, शूद्र वृत्ति इत्यादि । अतः हमने जिस विषय पर वृत्ति को