भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १५६ ) घट संज्ञा हुई। दूसरी घट संज्ञा के होने से समता कहां रही, जब समता ही नहीं है तो प्रत्यभिज्ञा कैसी ? क्योंकि वह प्रत्य- भिज्ञा उसी पदार्थ में होती है जिसको कभी पहिले देखा हो, और जो घड़ा पहिले देखा था उसका तो नाश होगया, जिसको अब देख रहे हैं वह दूसरा है, तो वह पहिले देखा हुआ नहीं हो सकता, इसी से प्रत्यभिज्ञा भी नहीं हो सकती। प्र०—सम्बन्धी अनित्य हो परन्तु सम्बन्ध तो नित्य ही मानना चाहिये ? उ०—नातः सम्बन्धो धर्मिग्राहकमानबाधात्॥६८ अर्थ—जबकि संज्ञा-संज्ञी दोनों ही अनित्य सिद्ध हुये तो उनका संबन्ध कैसे नित्य हो सकता है ? क्योंकि संबन्ध जिन प्रमाणों से सिद्ध होता है उनसे ऐसा कहना नहीं बन सकता कि सम्बन्धी चाहे अनित्य हो पर सम्बन्ध को नित्य मानना चाहिये। उत्तर यह है कि यह बात किसी प्रकार ठीक नहीं हो सकती कि सम्बन्धी तो अनित्य हो और सम्बन्ध नित्य हो। प्र०—गुण और गुणी का नित्य समवाय सम्बन्ध शास्त्रों से सुना जाता है और वास्तव में वे दोनों अनित्य हैं, यह कैसे ठीक होसकता है ? उ०—न समवायोऽस्ति प्रमाणाभावात् ॥६६॥ अर्थ—समवाय कोई सम्बन्ध नहीं है प्रमाण के न होने से। उभयत्राप्यन्यथासिद्धेर्न प्रत्यक्षमनुमानं वा ॥१०० अर्थ—घड़ा मिट्टी से बना है व बना होगा, इन दोनों तरह के ज्ञानों में अन्यथा सिद्धि है, इसवास्ते समवाय को मानने की कोई ज़रूरत नहीं। इस सूत्र का स्पष्ट भाव यह है कि घट का उपादान कारण मिट्टी है और यह बात प्रत्यक्ष दीखती है कि मिट्टी से ही