सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १५८ ) अर्थ—घटादि पदार्थों की शक्ति का प्रकाश होना प्रत्यभिज्ञा में हेतु नहीं हो सकता; क्योंकि यह बात तो अर्थापत्ति से सिद्ध है। यदि सब घड़ों में समान ( बराबर ) शक्ति न होती तो उन- का घड़ा नाम क्यों होता ? इसवास्ते समान आकृति और समान शक्ति प्रत्यभिज्ञा का हेतु नहीं हो सकती; किन्तु वही पदार्थ जो पहिले देखा है दूसरी बार के देखने से प्रत्यभिज्ञा का हेतु हो सकता है। इस बात से सिद्ध हो गया कि सामान्य पदार्थ अनित्य होने पर भी स्थिर है और इसी से प्रत्यभिज्ञा भी होती है। प्र०—एक घड़े में जो संज्ञा ( नाम ) संज्ञी ( नाम वाला ) सम्बन्ध है वही सम्बन्ध दूसरे घड़े में भी है फिर उसमें प्रत्य- भिज्ञा क्यों नहीं होती ? उ०—न संज्ञासंज्ञिसम्बन्धोऽपि ॥ ६६ ॥ अर्थ—संज्ञा-संज्ञी का सम्बन्ध भी प्रत्यभिज्ञा में हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि ये भी अर्थापत्ति से जाना जा सकता है कि संज्ञा- संज्ञि सम्बन्ध सब घड़ों में बराबर है; परन्तु इतने पर भी अनेक घड़ों में अनेक भेद रहते हैं, इस कारण प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, और संज्ञासंज्ञि सम्बन्ध होने पर भी दूसरा पदार्थ प्रत्यभिज्ञा का हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि— न सम्बन्धनित्यतोभयानित्यत्वात् ॥ ६७ ॥ अर्थ—घटादि पदार्थों का सम्बन्ध नित्य नहीं है; क्योंकि संज्ञा और संज्ञी यह दोनों अनित्य हैं। तात्पर्य यह है कि जो घड़ा घट नाम से पुकारा जाता है उस घड़े के नाश होते ही उसकी संज्ञा का भी नाश हो जाता है, क्योंकि उस घड़े के टूटने पर उस को फिर घड़ा नहीं कह सकते हैं किन्तु कपाल ( ठीकरा ) कह सकते हैं। जबकि फिर दूसरा घड़ा नजर आया तो उसकी दूसरी