भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 192 में से

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( १५७ ) क्योंकि उनकी विद्यमानता दीखती है। आशय यह है, कि जब आचार्य प्रकृति और पुरुष के सिवाय सबको अनित्य मानते हैं तो प्रत्यभिज्ञा कैसे होगी ? इस शङ्का को दूर करने के वास्ते यह सूत्र कहा गया है, कि सामान्य पदार्थ किसी प्रकार अनित्य नहीं हो सकते हैं; क्योंकि वे भी दीखते हैं। प्र०—प्रत्यभिज्ञा के वास्ते जो सामान्य पदार्थों को स्थिर माना गया है उनको स्थिर मानने की क्या ज़रूरत है ? क्योंकि जिस पदार्थ में प्रतिभिज्ञा होती है, उस तरह के दूसरे पदार्थ में भी प्रतिभिज्ञा हो सकती है; जैसे—किसी वक्त में घड़े को देखा था कुछ दिनों बाद उसी सूरत का एक घड़ा और देखा उसमें भी यही बात घट सकती है, कि जो घड़ा पहले देखा था वोही यह है, क्योंकि घड़े तो दोनों एक ही सूरत के हैं ? उ०—न तत्त्वान्तरं सादृश्यं प्रत्यक्षोपलब्धेः॥६४ अर्थ—एक घड़े के समान दूसरा घड़ा प्रत्यभिज्ञा का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि यह बात तो प्रत्यक्ष ही से दीखती है, कि जो घड़ा पहिले देखा था उसमें, और जो अब देखा है इसमें फ़र्क़ है। इसलिये सदृश ( समान ) पदार्थ प्रत्यभिज्ञा का कारण नहीं है, इस कारण सामान्य पदार्थ और उनकी स्थिरता माननी पड़ेगी। प्र०—जो शक्ति पहिले देखे हुये घड़े में है वही शक्ति इस समय दीखते हुये घड़े में है। उस शक्ति के ही प्रकाश होने से प्रत्यभिज्ञा क्यों न मानी जाय। क्योंकि सब घड़े एक ही शक्तिवाले होते हैं, इसवास्ते दूसरे घड़े के देखने से प्रतिभिज्ञा को मानना ही चाहिये ? उ०—निजशक्त्यभिव्यक्तिर्वा वैशिष्ट्यात् तदुपलब्धेः ॥ ६५ ॥

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