सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १५५ ) हैं ? क्योंकि जो कार्ये है उसका कारण भी अवश्य ही कोई न कोई होगा । प्र०-जबकि प्रकृति और पुरुष दोनों ही आकार रहित हैं तो उनका प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है; क्योंकि जबतक रूप न होगा तबतक प्रत्यक्ष नहीं हो सकता ? उ०-न रूपनिबन्धनात् प्रत्यक्षनियमः ॥ ८६ ॥ अर्थ-रूप के बिना प्रत्यक्ष नहीं होता, कोई नियम नहीं है ; क्योंकि जो बाहर की वस्तु है उसके देखने के वास्ते अवश्यमेव इन्द्रिय से योग की आवश्यकता रहती है, लेकिन जो ज्ञान से जाना जाता है उसको रूपवान होने की कोई आवश्यकता नहीं है, और नास्तिक लोग जो यह बात कहते हैं कि साकार पदार्थ का ही प्रत्यक्ष होता है, निराकार का नहीं होता, यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि जब नेत्र आदि इन्द्रियों में दोष हो जाता है तब सामने रक्खे हुए घट-पटादि पदार्थों का भी प्रत्यक्ष नहीं होता । इस से साबित होता है कि पदार्थ का स्वरूप होना प्रत्यक्ष होने में नियम नहीं, किन्तु इन्द्रियों की स्वच्छता हेतु है । प्र०-आपने जो अणुओं को कार्य्यरूप कहकर अनित्य सिद्ध किया तो क्या अणु कोई वस्तु आपके मत में है या नहीं ? इसपर आचार्य्य अपना मत दिखाते हैं । उ०-न परिमाणचातुर्विध्यं द्वाभ्यां तद्योगात् ॥६० अर्थ-जो मनुष्य अणु, महत्, दीर्घ, ह्रस्व यह चार भेद मान- कर परिमाण चार तरह के मानते हैं ऐसा मानना ठीक नहीं है ; क्योंकि जिस बात के सिद्ध करने को चार प्रकार के परिमाण मानते हैं वह बात अणु और महत् इन दो तरह के परिमाणों से भी सिद्ध हो सकती है । दीर्घ और ह्रस्व यह दो परिमाण महत्