भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( १३४ ) कहते हैं । विशेष व्याख्या इस तरह है, कि जैसे पहाड़ पर आग है, क्योंकि धुँआ दीखता है। जहाँ-जहाँ धुंआँ होता है, वहीं- वहीं आग भी अवश्य होती है । इसका नाम ही व्याप्ति है। इससे यह जानना चाहिये, कि धुँआँ बिना आग के नहीं रह सकता, परन्तु आग बिना धुएँ के रह सकती है ; इससे सिद्ध हुआ, कि धुएँ का आग के साथ रहना नियत धर्म-साहित्य है; परन्तु यह एक का नियत धर्म-साहित्य हुआ । चार्वाक ने जो अग्नि घोड़े का दृष्टान्त देकर व्याप्ति का खण्डन किया था, वह भी सत्य नहीं हो सकता ; क्योंकि घोड़ा तो सैकड़ों जगह बिना अग्नि के दीखने में आता है और आग को बिना घोड़े के देखते हैं, इस वास्ते वह साहचर्य नहीं रहा, अतएव वह सब अयुक्त सिद्ध हो गया । अब रहा दोनों का नियत धर्म-साहित्य वह गंध और पृथिवी में मिलता है, अर्थात् जहाँ पृथिवी होगी, वहाँ गंध अवश्य होगा, और जहाँ गंध होगी वहाँ पृथिवी भी अवश्य होगी। इन दोनों में से बिना एक के एक नहीं रह सकता है। न तत्वान्तरं वस्तुकल्पनाऽप्रसक्तेः ॥ ३० ॥ अर्थ—पहिले सूत्र में जो व्याप्ति का लक्षण किया गया है, उसके सिवाय किसी और पदार्थ का नाम व्याप्ति नहीं हो सकता, क्योंकि इस प्रकार अनेक तरह की व्याप्ति मानने में एक नया पदार्थ कल्पना करना पड़ेगा। इस वास्ते व्याप्ति का वही लक्षण सत्य है जो पहिले सूत्र में किया है । निजशक्त्युद्भवमित्याचार्याः ॥ ३१ ॥ अर्थ—जो व्याप्य की शक्ति से उत्पन्न किसी विशेष शक्ति का रूप हो, वही व्याप्ति आचार्यों के मत में मानने लायक है। इस सूत्र का आशय इस दृष्टान्त से समझाना चाहिये, कि व्याप्य

( १३५ ) जो अग्नि है, उसकी ही शक्ति से धुंआँ उत्पन्न होता है, और वह धुआँ आग की किसी विशेष शक्ति का रूप है । इसी तरह के पदार्थ को व्याप्ति कहते हैं ; और जिस में यह बात नहीं है, वह व्याप्ति किसी प्रकार नहीं हो सकती । प्र०—धुआँ आग की शक्ति से पैदा नहीं होता है, गीले ईंधन की शक्ति से पैदा होता है ? उ०—यह कहना ठीक नहीं है, यदि गीले ईंधन में ऐसी शक्ति होती तो वायु ( हवा ) के संयोग होने से ईंधन में से धुआँ क्यों नहीं उत्पन्न होता परन्तु ऐसा देखने में नहीं आता ; इससे यह बात माननी पड़ेगी कि धुआँ अग्नि की शक्ति विशेष है । आधेयशक्तियोग इति पञ्चशिखः ॥ ३२ ॥ अर्थ—आधार में जो आधेय-शक्ति रहती है, उसको ही पंचशिख नाम वाले आचार्य व्याप्ति मानते हैं । इसका आशय भी इस दृष्टान्त से समझ लेना चाहिये, कि आधार जो आग है, उसमें आधेय जो धुआँ, उसके रहने की जो शक्ति है, उसको व्याप्ति कहते हैं । प्र०—जब आग में धुआँ नहीं दीखता है, तब उसमें व्याप्ति का नाश हो जाता है क्या ? उ०—नहीं ! क्योंकि धुएं का आविर्भावतिरोभाव होता रहता है, अर्थात् धुआँ कभी उत्पन्न होता है कभी उसी के भीतर लय हो जाता है ; किन्तु आग से धुआँ नाश नहीं होता है । इसवास्ते व्याप्ति का नाश नहीं हो सकता, इसको पहले अध्याय में विस्तार- पूर्वक कह आये हैं । प्र०—आधार में आधेय शक्तिमत्व क्यों कल्पना किया जाता है, आधार की स्वरूपशक्ति को ही व्याप्ति क्यों नहीं मानते ?

( १३६ ) उ०—न स्वरूपशक्तिर्नियमः पुनर्वादिप्रसक्तेः॥३३ अर्थ—व्याप्य ( आधार ) की स्वरूपशक्ति को नियम अर्थात् व्याप्ति नहीं मान सकते ; क्योंकि उसमें फिर झगड़ा पड़ने का भय है। अब उस झगड़े को लिखते हैं कि जिसका भय है— विशेषणानर्थक्यप्रसक्तेः ॥ ३४ ॥ अर्थ—विशेषण देना व्यर्थ हो जायगा, जैसे कहा गया है, कि बहुत धुएँ वाली आग है। इस वाक्य में 'बहुत' शब्द विशेषण है, और 'धुआँ' विशेष्य है ; इसी तरह 'धुआँ' आधेय है, और आग आधार है। यदि धुएँ को अग्नि की स्वरूपशक्ति मान लें, तो बहुत शब्द को क्या मानें ; क्योंकि उस 'बहुत' शब्द को अग्नि की स्वरूपशक्ति नहीं मान सकते, और उस वाक्य के साथ होने से वह शब्द अपना कुछ अर्थ भी अवश्य रखता है, एवं उस अर्थ से स्वरूप शक्ति में न्यूनाधिकता ( कमती-बढ़ती ) भी अवश्य हो जाती है, तो उसको भी कुछ न कुछ अवश्य मानना चाहिये। यदि न माना जायगा, तो उसका उच्चारण करना व्यर्थ हुआ जाता है, और महात्माओं के अक्षर व्यर्थ नहीं होते। और भी दूसरा झगड़ा प्राप्त होता है कि— पल्लवादिष्वनुपपत्तेश्च ॥ ३५ ॥ अर्थ—जैसेकि पत्तों का आधार पेड़ है, और व्याप्ति का लक्षण स्वरूपशक्ति मानकर वृक्ष की शक्तिस्वरूप जो पत्ते हैं, वही व्याप्ति के कहने से ग्रहण हो सकते हैं। इस प्रकार मानने में यह दोष रहेगा, कि जैसे वृक्ष की स्वरूपशक्ति पत्तों को मान लिया, और वही व्याप्ति भी होगई, तो पत्तों के टूटने पर व्याप्ति का भी नाश मानना पड़ेगा। यदि व्याप्ति का नाश माना जायगा, तो बड़ाभारी झगड़ा उत्पन्न हो जायगा, और

( १३७ ) प्रत्यक्षवादी चार्वाक नास्तिक का मत पुष्ट हो जायगा, इसवास्ते ऐसा न मानना चाहिये, कि आधार की स्वरूपशक्ति का ही नाम व्याप्ति है। अब इस बात का निश्चय करते हैं, कि आचार्य और पंचशिख नामक आचार्य के मत में भेद है या नहीं। क्योंकि पंचशिख नाम वाला आचार्य तो आधार ( आग ) में आधेय ( धुवें ) की शक्ति होने को व्याप्ति मानता है ; और आचार्य मुनि कपिलजी व्याप्त आग की शक्ति से उत्पन्न हुये सिीक विशेष शक्ति को दूसरा पदार्थ मानकर उसको व्याप्ति मानते हैं। इन दोनों में से कौन सत्य है ? आधेय शक्ति सिद्धौ निज शक्ति योगः समा- नन्यायात् ॥ ३६ ॥ अर्थ—समानन्याय अर्थात् बराबर युक्ति होने से जैसेकि आधेय-शक्ति की सिद्धि होती है वैसे ही निज-शक्तियोग की, यह आचार्यों का मत भी सत्य है। दोनों में से कोई भी युक्ति हीन नहीं मानते हैं। यह व्याप्ति का झगड़ा केवल इसी वास्ते उत्पन्न किया गया था कि गुण आदि स्वरूप से नाशवान नहीं है। इस पक्ष की पुष्टि करने के वास्ते आचार्य को अनुमान प्रमाण की आवश्यकता हुई और वह अनुमान प्रमाण पंचावयव के बिना नहीं हो सकता था, इस वास्ते उनको लिखन पड़ा। इसी निश्चय में पंचावयव के अन्तर्गत एक साहचर्य नियम जिसका दूसरा नाम व्याप्ति आन पड़ा उसको प्रकाश करने के वास्ते यह कहकर अपने पक्ष को पुष्ट कर लिया। अब इससे आगे पंचावयव रूप शब्द को ज्ञान की उत्पत्ति में हेतु सिद्ध करने के वास्ते शब्द की शक्तियों का प्रकाश करके उस शब्द-प्रमाण में बाधा डालने वालों के मत का खण्डन करते हैं—

( १३८ ) वाच्यवाचकभावः सम्बन्धः शब्दार्थयोः ॥३७॥ अर्थ—शब्द के अर्थ में वाच्यता-शक्ति रहती है, और शब्द में वाचता-शक्ति रहा करती है, इसको ही शब्द और अर्थ का वाच्य-वाचकभाव-सम्बन्ध कहते हैं, अर्थात् शब्द अर्थ को कहा करते हैं, और अर्थ शब्द में कहा जाता है । यही इन शब्दार्थों का सम्बंध है । उस वाच्य-वाचकतारूप-शक्ति को कहते हैं । त्रिभिः सम्बन्ध सिद्धिः ॥ ३८ ॥ अर्थ—पहिले कहे हुये सम्बन्ध की सिद्धि तीन तरह से होती है—एक तो आप्त ( पूर्ण विद्वान् ) के उपदेश से; दूसरे वृद्धों के व्यवहार से ; तीसरे संसार में जो प्रसिद्ध बर्ताव में आने- वाले पद हैं, उनके देखने से । इन ही तीन तरह के शब्दों का वाच्य-वाचकभाव होता है । उसको इस तरह समझना चाहिये, कि आप्तों के द्वारा ऐसे शब्दों का ज्ञान होता है, जैसे ईश्वर निराकार सत्चित्आनन्दस्वरूप है। जब ईश्वर शब्द कहा जावेगा, तब पूर्वोक्त ( पहिले कहे हुए ) विशेषण वाले पदार्थ का ज्ञान होगा, और वृद्धों के व्यवहार से यह मालूम होता है, कि जिसके सास्ना ( गौ के कंधों के नीचे जो लंबी सी खल लटकती है ) और लांगूल ( पूंछ ) होती है, उसको गौ कहते हैं, ऐसा ज्ञान हो जाने पर जब-जब गौ शब्द का उच्चारण होगा, तब उसी अर्थ का ज्ञान हो जायगा, और प्रसिद्ध शब्दों का व्यवहार इस तरह है, कि जैसे कपित्थ एक वृक्ष का नाम है, वह क्यों कपित्थ शब्द से प्रसिद्ध है ? इस प्रकार का तर्क न करना चाहिये ; क्योंकि लोकप्रसिद्ध होने के कारण कपित्थ शब्द कहने से कपित्थ ( कैथ ) का ही ग्रहण होता है । न कार्ये नियम उभयथा दर्शनात् ॥ ३६ ॥

( १३६ ) अर्थ—यह कोई नियम नहीं है, कि शब्द-शक्ति का वाच्य- वाचकभाव कार्य में ही हो, और जगह नहीं ; क्योंकि दोनों तरह शब्द की शक्तियों का ग्रहण दीखता है। शास्त्रों में जैसे किसी वृद्ध ने बालक से कहा “गौ को लाओ”। इस वाक्य के कहने से गौ का लाना यह कार्य दीखता है, और इसके शब्द भी उस अर्थ को ही दिखलाते हैं, और तेरे पुत्र उत्पन्न हो गया इसमें कार्य का प्रत्यक्ष भाव नहीं दिखाई पड़ता है। क्योंकि पुत्र का उत्पन्न होना यह जो क्रिया है वह पहिले ही हो चुकी और यह वाक्य उस बीती हुई क्रिया को कहता है; इस वास्ते यह नियम नहीं कि कार्य में ही शब्द और अर्थ का सम्बन्ध हो। प्र०—यह उपरोक्त प्रतीति लौकिक बातों में हो सकती है, क्योंकि संसार में बहुधा कार्य शब्दों का प्रयोग किया जाता है; किन्तु वेद में जो शब्द हैं, उनके अर्थ का ज्ञान कैसे होता है? क्योंकि शब्द कार्य नहीं है। उ०—लोके व्युत्पन्नस्य वेदार्थप्रतीतिः ॥४०॥ अर्थ—जो मनुष्य सांसारिक कार्यों में चतुर होते हैं, वही वेद को यथार्थ रीत से जान सकते हैं, क्योंकि ऐसा कोई भी लोक का हितकारी कार्य नहीं है, जो वेद में न हो; इसवास्ते वेद में विज्ञता उत्पन्न करने के अर्थ सांसारिक जीवों को योग्यता प्राप्त करनी चाहिये और शब्दों की शक्ति लोक ( संसार ) और वेद इन दोनों में बराबर है। इस विषय पर नास्तिक शंका करते हैं— न त्रिभिरपौरुषेयत्वाद्वेदस्य तदर्थस्यातीन्द्रिय- त्वात् ॥४१॥ अर्थ—आपने जो तीन प्रमाण दिये उन प्रमाणों से वेद के अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि मनुष्य मनुष्य की बात

( १४० ) का समझ सकता है, परन्तु वेद अपौरुषेय ( जो किसी मनुष्य का बनाया हुआ न हो ) है, इसवास्ते उसका अर्थ इन्द्रियों से ज्ञात नहीं हो सकता है ; क्योंकि वह वेद अतीन्द्रिय है, अर्थात् इन्द्रियों की शक्ति से बाहर है । इसका समाधान करने के वास्ते पहिले इस बात को सिद्ध करते हैं कि वेदों का अर्थ प्रत्यक्ष देखने में आता है, अतीन्द्रिय नहीं है । न यज्ञादेः स्वरूपतो धर्मत्वं वैशिष्ट्यात् ॥४२॥ अर्थ—वेद के अर्थ को जो अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से न जाना जाय ) कहा सो सत्य नहीं । वेद से जो यज्ञादि किये जाते हैं, और उन यज्ञादिकों में जो-जो काम किये जाते हैं, वे सब स्वरूप से ही धर्म हैं, क्योंकि उन यज्ञादिकों का फल प्रत्यक्ष में दीखता है, जैसे—“यज्ञाद्भवतिपर्जन्यः पर्जन्यादन्नसम्भवः” । यज्ञ से मेघ होता है, और मेघ के होने से अन्न उत्पन्न होता है, इत्यादि वाक्य गीता में मिलते हैं । प्र०—जबकि वेद अपौरुषेय हैं, तब उनका अर्थ कैसे ज्ञात होता है ? उ०—निजशक्तिव्युत्पत्या व्यवच्छिद्यते ॥४३॥ अर्थ—शब्द का अर्थ होना यह शब्द की स्वाभाविकी शक्ति है, और विद्वानों की परम्परा से वह शक्ति वेद के अर्थों में भी चली आती है, और उसी व्युत्पत्ति ( वाक़फ़ियत ) से वृद्ध लोग शिष्यों को उपदेश करते चले आये हैं, कि इस शब्द का ऐसा अर्थ है । और जो ऐसा कहते हैं, कि वेदों का अर्थ प्रत्यक्ष नहीं है, किन्तु अतीन्द्रिय, उसका यह समाधान है । योग्यायोग्येषु प्रतीतिजनकत्वात् तत्सिद्धिः ॥४४॥ अर्थ—ब्रह्मचर्यादि जिन-जिन कार्यों को वेद ने अच्छा कहा है, और हिंसादि जिन-जिन कार्यों को बुरा कहा है, उनकी प्रतीति

( १४१ ) प्रत्यक्षता में दीखती है, अर्थात् इन दोनों कार्यों का जैसा फल वेद में लिखा है वैसा ही देखने में आता है। इससे इस बात की सिद्धि हो गई कि वेद का अर्थ अतीन्द्रिय नहीं है। प्र०—न नित्यत्वं वेदानां कार्यत्वश्रुतेः ॥४५॥ अर्थ—वेद नित्य नहीं है, क्योंकि श्रुतियों से मालूम होता है, कि “तस्माद्यज्ञात्सर्व हुत ऋचः सामानि जज्ञिरे”। उस यज्ञरूप परमात्मा से ऋग्वेद, सामवेद, उत्पन्न हुये इत्यादि श्रुतियाँ पुकार- पुकार कह रही हैं कि वेद उत्पन्न हुये। जब ऐसा सिद्ध हो गया, तो यह बात निश्चय ही है, कि जिसकी उत्पत्ति है, उसका नाश भी अवश्य है; इस वास्ते वेद कार्यरूप होने से नित्य नहीं हो सकते हैं। उ०—न पौरुषेयत्वं तत्कर्त्तुः पुरुषस्याभा- वात् ॥४६॥ अर्थ—वेद किसी पुरुष के बनाये हुये नहीं हैं, क्योंकि उनका बनानेवाला दीखता नहीं। तब यह बात माननी पड़ेगी, कि वेद, अपौरुषेय हैं, जबकि वेदों का अपौरुषेयत्व सिद्ध हो गया, तो वह जिसके बनाये हुये वेद हैं नित्य हैं; और नित्य के कार्य भी नित्य होते हैं, इस कारण वेदों का नित्यत्व सिद्ध हो गया। यदि ऐसा कहा जावे, कि वेदों को भी किसी जीव ने बनाया होगा सो भी सत्य नहीं। मुक्तामुक्तयोरयोग्यत्वात् ॥४७॥ अर्थ—जीव भी दो प्रकार के होते हैं—एक तो मुक्त, दूसरे अमुक्त। यह दोनों प्रकार के जीव वेद के बनाने के अधिकारी नहीं हैं। कारण यह है कि मुक्त जीव में वह शक्ति नहीं रहती, जिससे वेद बना सकें, और बद्ध जीव अज्ञानी अल्पज्ञ (थोड़ा

( १४२ ) जाननेवाला ) इत्यादि दोषों से युक्त होता है और वेद में इस प्रकार की बातें देखने में आती हैं, जो बिना सर्वज्ञ के नहीं हो सकतीं, और जीव अल्पज्ञ है, इस प्रमाण से भी वेदों की नित्यता सिद्ध हो गई। इसी विषय को और भी दृढ़ करते हैं। नापौरुषेयत्वान्नित्यत्वमंकुरादिवत् ॥४८॥ अर्थ—वेद अपौरुषेय हैं, इसवास्ते नित्य हैं, ऐसा नहीं ; क्योंकि अंकुर किसी पुरुष का बनाया हुआ नहीं होता, परन्तु अनित्य होता है। तेषामपि तद्योगे दृष्टबाधादिप्रसक्तिः ॥४९॥ अर्थ—यदि वेदों को भी बनाया हुआ माना जायगा, तो प्रत्यक्ष जो दीखता है, उसमें दोष प्राप्त होगा। दृष्टान्त—जैसे कि अंकुर का लगानेवाला दीखता है और उपादान कारण जो बीज है वह भी दीखता है। इस प्रकार वेदों का बनानेवाला और उपादान कारण नहीं दीखता है, इस कारण नित्य है। यदि नित्य न माना जाय, तो प्रत्यक्ष से विरोध हो जायगा। वेदों को जो अपौरुषेय कहा है, उसमें यह सन्देह होता है कि पौरुषेय किसको कहते हैं और अपौरुषेय किसको कहते हैं ? इस सन्देह को दूर . करने के लिये पौरुषेय का लक्षण लिखते हैं। यस्मिन्नदृष्टेऽपि कृतबुद्धिरुपजायते तत्पौरुषे- यम् ॥५०॥ अर्थ—जिस पदार्थ का कर्त्ता प्रत्यक्ष न हो, अर्थात् बनाने वाला न दीखता हो, लेकिन उस पदार्थ के देखने से यह ज्ञान हो, कि इसका बनानेवाला कोई अवश्य है ; इसका ही नाम पौरु- षेय है। लेकिन वेदों के देखने से यह बुद्धि उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि वेदों की उत्पत्ति ईश्वर में मानी गई है और उन वेदों

सूत्र में नास्तिक ने यह-पूर्व पक्ष किया था, कि वेदों का अर्थ नहीं

( १४३ ) का बनानेवाला कोई नहीं है, और उत्पत्ति, बनाना दोनों में इतना अन्तर है कि बीज से अंकुर उत्पन्न हुआ, कुम्हार ने घड़े को बनाया, इस बात. को बुद्धिमान अपने आप विचार लेवें, कि उत्पत्ति और बनाना इसमें भेद है या नहीं ? बनाना कोई और बात है, उत्पत्ति कोई और बात है। इस तरह ही वेदों की उत्पत्ति मानी गई है, ; किन्तु घटादि पदार्थों के समान वेदों की उत्पत्ति नहीं है। इस कारण वेद अपौरुषेय हैं। प्र०—जब कि वेदों में उन्हीं बातों का वर्णन है, जो संसार में वर्त्तमान हैं, तो वेदों को क्यों प्रमाण माना जाय ? उ०—निजशक्त्यभिव्यक्तेः स्वतः प्रामा- ण्यम् ॥ ५१ ॥ अर्थ—जिस वेद के ज्ञान होने से अर्थात् जानने से आयुर्वेद ( वैद्यक ), कला-कौशल आदि सब तरह की विद्याओं का प्रकाश होता है वह वेद स्वतः ( अपने आप ) प्रमाण है। उस में दूसरे प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जो आप ही दूसरों का प्रमाण है, उसका प्रमाण किसको कह सकते हैं, जैसे—सेर-दुसेरी आदि तोलने को बाट तोलने में आप ही प्रमाण हैं, लेकिन सेर-दुसेरी आदि बाट क्यों प्रमाण है, ऐसा प्रश्न कहीं हो सकता, क्योंकि वह तो स्वतः प्रमाण है। इसी तरह वेदों को भी स्वतः प्रमाण समझना चाहिये। पहिले जो ४१ वें सूत्र में नास्तिक ने यह-पूर्व पक्ष किया था, कि वेदों का अर्थ नहीं हो सकता, उसका उत्तर-पक्ष वहाँ पर कह आये थे, और फिर भी उसको ही दृष्टान्त द्वारा प्रत्यक्ष करते हैं। नासतः ख्यानं नृशृङ्गवत् ॥ ५२ ॥ अर्थ—जैसे कि पुरुष के सींग नहीं होते, इसी तरह जो पदार्थ है ही नहीं, उसका कहना भी व्यर्थ है, जैसे कि वन्ध्या

( १४४ ) स्त्री का पुत्र । जबकि वन्ध्या स्त्री के पुत्र होता ही नहीं तो ऐसा कहना भी व्यर्थ है। यदि इस तरह वेदों का भी कुछ अर्थ न होता तो वृद्ध लोग परम्परा से (एक को एकने पढ़ाया ) क्यों शिष्यों को पढ़ा कर प्रसिद्ध करते । इससे प्रत्यक्ष होता है कि वेदों का अर्थ है । न सतोबाधदर्शनात् ॥ ५३ ॥ अर्थ—जो पदार्थ सत् है उसका बाध किसी तरह नहीं हो सकता और वेद सत् माने गये हैं, इसवास्ते ऐसा कहना नहीं बन सकता कि वेदार्थ नहीं है । प्र०-वेदार्थ है या नहीं, ऐसा झगड़ा क्यों किया जाय, यही न कह दिया जावे, कि वेद का अर्थ है तो, परन्तु अनिर्वचनीय है। नानिर्वचनीयस्य तदभावात् ॥ ५४ ॥ अर्थ—वेद के अर्थ को अनिर्वचनीय ( जो कहने में न आव ) कहना ठीक नहीं, क्योंकि संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं दीखता जो अनिर्वचनीय हो, और उसी पदार्थ को कह सकते हैं, जो संसार में प्रत्यक्ष है; इसलिये अनिर्वचनीय कहना ठीक नहीं है । नान्यथाख्यातिः स्ववचोव्याघातात् ॥ ५५ ॥ अर्थ—अन्यथा ख्याति भी नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा कहने पर अपने ही कथन में दोष प्राप्त होता है । इस सूत्र का अभिप्राय यह है, कि वेद का अर्थ दूसरा है, परन्तु संसार में दूसरी तरह प्रचलित हो रहा है, इस तरह की अन्यथा ख्याति करने पर यह दोष होता है, कि जो मनुष्य वेद का अर्थ ही न मान कर अनिर्वचनीय कहते हैं, वह न्याय अख्याति को क्यों मान सकते हैं, ऐसा कहना उनके वचन से ही विरुद्ध होगा ।

सूत्र तक जो अर्थ विज्ञानभिक्षु ने किया है, और “गुणादीनां

( १४५ ) प्र०—अन्यथा ख्याति किसको कहते हैं ? उ०—पदार्थ तो दूसरा हो, और अर्थ दूसरी तरह किया जाय, जैसे—सीप में चाँदी का आरोप करना अर्थात् चाँदी सिद्ध करनी । सदसत्ख्यातिर्बाधाबाधात् ॥ ५६ ॥ अर्थ—यह ऐसा माना जाय, कि वेदों का अर्थ है भी और नहीं भी है, क्योंकि जो संसार के कार्यों में चतुर नहीं हैं उन- को वेद के अर्थ का बाध होता है ; और जो सांसारिक कार्यों में चतुर हैं, उनको अबाध होता है, इस तरह स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, है या नहीं, इस तरह जैनों के मत के अनुसार ही माना जाय, तो भी ठीक नहीं। इस सूत्र में पहिले सूत्र से नकार अनुवृत्ति आती है। “नासत:ख्यातं न शृंगवत्” इस सूत्र से लेकर ५६ वें सूत्र तक जो अर्थ विज्ञानभिक्षु ने किया है, और “गुणादीनां नात्यन्तबाध:”, इस सूत्र के आशय से मिलाया है, वह ठीक नहीं ; क्योंकि वैसा अर्थ करने से प्रसंग में विरोध आता है। दूसरे यह कि इस ५६वें सूत्र को, जो कपिल मुनि के सिद्धान्त पक्ष में रखकर गुणों का बाध, अबाध दोनों ही माने हैं, वह भी ठीक नहीं, क्योंकि “न तादृक् पदार्थाप्रतीते:”, इस सूत्र में आचार्य पहिले ही कह चुके हैं, कि असत् और सत् इन दोनों धर्म्मों वाला कोई पदार्थ संसार में नहीं दीखता, तो क्या आचार्य भी विज्ञानभिक्षु के समान ज्ञान-रहित थे, जो अपने पूर्वापर कथन को ध्यान में न रख कर गुणों को सत् और असत् दोनों रूपों से कहते। यहां तक वेदों की उत्पत्ति और नित्यता को सिद्ध कर चुके। अब शब्द के सम्बन्ध में विचार करते हैं। प्रतीत्यप्रतीतिभ्यां न स्फोटात्मक: शब्द: ॥५७॥ अर्थ—जो शब्द मुख से निकलता है, उस शब्द के अतिरिक्त जो उस शब्द में अर्थ के ज्ञान कराने वाली शक्ति है, उसे स्फोट

( १४६ ) कहते हैं ; जैसे कि—किसी ने कलश शब्द को कहा, तो उस कलश शब्द के उच्चारण होने से कम्बुग्रीवादि कपालों का जिस शक्ति से ज्ञान होता है, उसका ही नाम स्फोट है। इससे ऐसा न समझना चाहिये, कि कलश इतना शब्द मुँह से निकलते ही कम्बुग्रीव वाला जो पदार्थ है, उसका ही नाम कलश है, किन्तु जिस शक्ति से उसका ज्ञान होता है, उसी का नाम स्फोट कह- लाता है, किन्तु स्फोटात्मक शब्द नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें दो तरह के तर्क उत्पन्न हो सकते हैं, कि शब्द की प्रतीति होती है या नहीं। यदि प्रतीति होती है, तो जिस अर्थ वाले अक्षर समुदाय से पूर्वापर मिला कर अर्थ प्रतीति और वाच्य ( कहने लायक ) वस्तु का बोध ( ज्ञान ) है, उसके सिवाय स्फोट को मानना व्यर्थ है, क्योंकि शब्द से ही अर्थ ज्ञान हुआ, स्फोट से नहीं। और यह कहो कि शब्द की प्रतीति नहीं होती, तब अर्थ ही नहीं। फिर स्फोट में ऐसी शक्ति कहां से आई जो बिना अर्थ के अर्थ की प्रतीति करा सकै। इस कारण स्फोट का मानना व्यर्थ है। प्र०—न शब्दनित्यत्वं कार्य्यताप्रतीतेः ॥ ५८ ॥ अर्थ—शब्द नित्य नहीं हो सकता, क्योंकि उच्चारण के बाद शब्द नष्ट हो जाता है ; जैसे—ककार उत्पन्न हुआ, उच्चा- रणावसान में फिर नष्ट हो गया, इत्यादि अनुभवों से सिद्ध होता है कि शब्द भी कार्य्य है। उ०—पूर्व्वसिद्ध सत्त्वस्याभि व्यक्तिर्दीपेनैव - घटस्य ॥ ५९ ॥ अर्थ—जिस शब्द का होना पहिले ही से सिद्ध है, उस शब्द का उच्चारण करने से प्रकाश होता है, उसकी उत्पत्ति

( १४७ ) नहीं होती है । दृष्टान्त—जैसेकि अंधेरे स्थान में रक्खे हुये पात्र को दीपक प्रकाश कर देता है । ऐसा नहीं कह सकते कि दीये ने पात्र को उत्पन्न कर दिया, क्योंकि पात्र तो पहिले से ही वहाँ विद्यमान था, अंधकार के कारण उसका ज्ञान नहीं होता था। इसी तरह शब्द भी पहिले से सिद्ध है, उच्चारण करने से केवल उनका प्रकाश होता है, इसलिये शब्द नित्य है । सत्कार्यसिद्धांतश्चेत् सिद्धसाधनम् ॥ ६० ॥ अर्थ—यदि ऐसा कहा जाय, कि कार्य जिस अवस्था में दीखता है, उसी अवस्था में सत् है, शेष और अवस्थाओं में असत् है। इसी तरह शब्द का भी कार्य है, और अपनी अवस्था में सत् है, ऐसा मानेंगे, तो आचार्य कहते हैं, कि ऐसा मनने पर हम शब्द के सम्बन्ध में सिद्ध साधन मानेंगे, अर्थात् जो शब्द पहिले हृदय में था, उसीको उच्चारण आदि क्रियाओं से स्पष्ट किया है, किन्तु घटादि पदार्थों के समान बनाया नहीं है । यहाँ- तक शब्द-विचार समाप्त हुआ। अब इस विषय का विचार करेंगे कि जीव एक है, वा अनेक हैं। नाद्वैतमात्मनो लिंगात् तद्भेदप्रतीतेः ॥ ६१ ॥ अर्थ—जीव एक नहीं है, किन्तु अनेक हैं, इस सूत्र का यह भी अर्थ है। जीव और ईश्वर इन दोनों का अभेद मानकर जो अद्वैत माना जाता है वह ठीक नहीं, क्योंकि जीव के जो अल्पज्ञत्वादि चिह्न हैं, और ईश्वर के जो सर्वज्ञत्वादि चिन्ह हैं, - उनसे दोनों में भेद ज्ञात होता है । नानात्मनापि प्रत्यक्षबाधात् ॥ ६२ ॥ अर्थ—अनात्मा जो सुख दुःखादिकों के भोग हैं। उनसे भी यही बात सिद्ध होती है, कि जीव एक नहीं है, क्योंकि एक

( १४८ ) मानने से प्रत्यक्ष में विरोध की प्राप्ति होती है, और संसार में दीखता भी है, कि सुख-दुःख अनेक व्यक्ति एक समय में भोग करते हैं, दूसरे पक्ष में ऐसा अर्थ करना चाहिये, कि जो मनुष्य एक आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते, उनके सिद्धांत में पूर्वोक्त दोष के अतिरिक्त और एक दोष यह भी प्राप्त हो जायगा, कि घटादि कार्यों को भी आत्मा मान कर उनके नाश होते ही आत्मा का भी नाश मानना होगा। यह प्रत्यक्ष से विरोध होगा, इसलिये ऐसा अद्वैत मानना सत्य नहीं है। नोभाभ्यां ते नैव ॥ ६३ ॥ अर्थ—आत्मा और अनात्मा इन दोनों की एकता है ऐसा कहना भी योग्य नहीं, क्योंकि उसी प्रत्यक्ष प्रमाण में बाधा प्राप्त हो जायगी, और संसार में यह बात प्रत्यक्ष दीख रही है, कि आत्मा और अनात्मा दो पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं, इस वास्ते ऐसा कहना कि एक आत्मा के अतिरिक्त और कुछ योग्य नहीं। प्र०—अगर तुम ऐसा मानते हो कि आत्मा और अनात्मा भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं, तो श्रुतियाँ ऐसा क्यों कहती हैं, कि “एकमेवा- द्वितीयंब्रह्म ।” “आत्मैवेदं सर्वम्” ( एक ही ब्रह्म अद्वितीय है ) ; यह सब आत्मा ही है ) इत्यादि श्रुतियाँ एक आत्मा बताती हैं, तो बहुत से आत्मा, जीव वा ब्रह्म पृथक्-पृथक् क्यों माने जाँय । उ०—अन्यपरत्वमविवेकानां तत्र ॥ ६४ ॥ अर्थ—इन श्रुतियों में अन्यपरत्व अर्थात् द्वैत है, ऐसा ज्ञान अज्ञों को होता है, और जो विद्वान् हैं वह इन श्रुतियों का ऐसा अर्थ नहीं करते हैं, क्योंकि अद्वितीय शब्द से यह प्रयोजन है, कि ईश्वर के समान दूसरा और कोई नहीं है, और जो एक आत्मा मानते हैं, उनके मत में संसार का उपादान कारण सत्य नहीं हो सकता।

( १४६ ) नात्माविद्या नोभयं जगदुपादानकारणं निःसङ्गत्वात् ॥ ६५ ॥ अर्थ—इस कारण आत्मा जगत् का उपादान कारण नहीं हो सकता कि वह निर्विकार है। यदि अविद्या को संसार का उपादान कारण मानें तो अविद्या भी संसार का उपादान कारण नहीं हो सकती, क्योंकि सत् मानें तो द्वैतापत्ति प्राप्त होती है, और असत् मानने पर बन्ध्या के पुत्र के सदृश (समान) अभाव वाली हो जायगी, और आत्मा तथा अविद्या यह दोनों मिलकर संसार का उपादान कारण इस प्रकार नहीं हो सकते कि आत्मा संग रहित है, इस कारण ही जो एक आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते, उनके मत में संसार का उपादान कारण सिद्ध नहीं हो सकता है। नैकस्यानन्दचिद्रूपत्वे द्वयोर्भेदात् ॥ ६६ ॥ अर्थ—वेदादि सत् शास्त्र ईश्वर को सच्चिदानन्द कहकर पुकार रहे हैं, और जीव में आनन्द रूप होना नहीं है, इस कारण ईश्वर और जीव इन दोनों में भेद है। प्र०—जीव में आनन्द तो माना ही नहीं गया है, तो मुक्ति का उपदेश क्यों कहा, क्योंकि मुक्ति अवस्था में दुःखों के दूर हो जाने पर आनन्द होता ही है ? उ०—दुःखनिवृत्तेर्गौणः ॥ ६७ ॥ अर्थ—मुक्त होने पर दुःख दूर हो जाते हैं, ऐसा कहना गौण है। यद्यपि मुक्ति होने पर दुःख दूर हो जाते हैं, परन्तु अल्पज्ञता तो जीव में उस समय भी बनी रहती है, इसलिये फिर भी दुःख उत्पन्न होने का भय बना ही रहता है, इस कारण जीव सर्वदा आनन्द में नहीं रहता है, अतः जीव को आनन्द-

( १५० ) स्वरूप नहीं कह सकते । आनन्दस्वरूप तो ईश्वर को ही कह सकते हैं । प्र०—जब कि आप की मुक्ति ऐसी है, कि जिसके होने पर भी फिर कुछ दिनों के बाद दुःख उत्पन्न होने की संभावना बनी रहती है तो ऐसी मुक्ति से बद्ध रहना ही अच्छा है । उ०—विमुक्तिप्रशंसा मन्दानाम् ॥ ६८ ॥ अर्थ—विमुक्त ( बद्ध रहना ) की प्रशंसा मूर्ख लोग करते हैं, न कि विद्वान् लोग । कोई-कोई मन को नित्य मानते हैं, उनके मत का भी खंडन करते हैं । न व्यापकत्वं मनसः करणत्वादिनिन्द्रियत्वाद्वा ६९ अर्थ—मन व्यापक नहीं है, क्योंकि मन को इन्द्रिय और कारण माना है । प्र०—कारण किसको कहते हैं ? उ०—जिसके द्वारा जो अपने कार्य करने में तैयार हो, जैसे कि मन के द्वारा जीवात्मा अपने कार्यों को करता है । सक्रियत्वाद्गतिश्रुतेः ॥ ७० ॥ अर्थ—मन क्रियावाला है इसलिये मन हर एक इन्द्रियों के व्यापार और प्रवृत्ति का हेतु है, गतिवाला भी है । प्र०—यदि मन को नित्य नहीं मानते तो मत मानो, लेकिन निर्विभाग, कारण रहित तो मानना होगा । उ०—न निर्भागित्वं तद्योगात् घटवत् ॥ ७१ ॥ अर्थ—जैसे घट आदि पदार्थ मृत्तिका ( मिट्टी ) के कार्य हैं इस ही तरह मन भी किसी का कार्य अवश्य है । जबकि कार्य निश्चय हो गया तो उसको कारण योग भी अवश्य होगा । प्र०—मन नित्य है या अनित्य ?

( १५१ ) उ०—प्रकृतिपुरुषयोरन्यत् सर्वमनित्यम् ॥ ७२ अर्थ—प्रकृति और पुरुष के अतिरिक्त जो अन्य पदार्थ हैं, वह सब अनित्य हैं, इस कारण से मन भी अनित्य है। प्र०—प्रकृति और पुरुष इन दो को ही नित्य क्यों माना है ? उ०—न भागलाभो भोगिनो निर्भागस्वश्रुतेः ७३ अर्थ—जो आप ही कारण रूप है, उसका और कोई कारण नहीं हो सकता, उसको तो सब ही कारण रहित मानते चले आये हैं, इस कारण प्रकृति, पुरुष दोनों नित्य हैं। प्र०—पुरुष की मुक्ति क्यों मानी गई है ? नानन्दाभिव्यक्तिमुक्तिर्निर्धर्मत्वात् ॥ ७४ ॥ अर्थ—प्रधान जो प्रकृति है, उसको आनन्द की अभिव्यक्ति (ज्ञान) नहीं हो सकती, इस कारण उसकी मुक्ति भी नहीं कह सकते; क्योंकि आनन्द प्रधान का धर्म नहीं है। किन्तु जीव का है। उ०—न विशेषगुणोच्छित्तिस्तद्वत् ॥ ७५ ॥ अर्थ—सत्व, रज, तम, इनके नाश होने को ही यदि मुक्ति माना जाय तो भी ठीक नहीं, क्योंकि उक्त सत्त्वादि तीन गुण प्रधान के स्वाभाविक धर्म हैं, उनका नाश होना प्रधान का धर्म नहीं है, इसलिये उसकी मुक्ति नहीं मानी जाती । न विशेषगतिर्निष्क्रियस्य ॥ ७६ ॥ अर्थ—यदि विशेष गति ऊपर नीचे का जाना, आना अर्थात् ब्रह्मलोक की प्राप्ति इत्यादिक को ही मुक्ति मानें सो भी नहीं हो सकती, क्योंकि प्रधान तो क्रिया शून्य है, जो कुछ उसमें क्रिया दीखती है वह सब पुरुष के संसर्ग (मेल) से है, परन्तु आप ऐसी शक्ति को नहीं रखता । नाकारो परागोच्छित्तिः क्षणिकत्वादिदोषात् ७७

( १५२ ) अर्थ— यदि आकार के सम्बन्ध को छोड़ देना ही मुक्ति मानें तो भी ठीक नहीं, क्योंकि उसमें क्षणिकत्वादि दोष प्राप्त होते हैं। इस सूत्र का स्पष्टार्थ यह है—प्रकृति का आकार घड़ा है, उसका फूट जाना है उसको ही प्रकृति की मुक्ति मान लिया जाय सो यह कथन कुछ अच्छा नहीं है, क्योंकि क्षणिकत्वादि सैकड़ों दोष प्राप्त हो जायेंगे, ऐसा मानने से । जैसेकि कोई घड़ा इस क्षण में टूट गया और फिर इसी क्षण में दूसार बन गया तो इत्यादि कारणों से प्रधान की मुक्ति कैसे होसकती, है ? न सर्वोच्छित्तिः पुरुषार्थत्वादिदोषात् ॥ ७८ ॥ अर्थ—सबको छोड़ देना भी मोक्ष नहीं होसकता । यदि प्रधान सम्पूर्ण ( सब ) सृष्टि आदि रचना को छोड़ दे तो भी उसकी मुक्ति नहीं होसकती, क्योंकि प्रधान के सब कार्य पुरुष के लिये हैं । एवं शून्यमपि ॥ ७६ ॥ अर्थ—यदि सब को जोड़ देना ही प्रधान की मुक्ति का लक्षण मान भी लिया जाय तो वह मुक्ति शून्य रहेगी, क्योंकि आनन्द न रहेगा तो व्यर्थ है, इसलिये ऐसा न साना जाय । प्र०—पुरुष के साथ रहने वाली प्रकृति किसी स्थान में पुरुष को छोड़ दे, इसको ही मुक्ति क्यों न माना जाय ? उ०—संयोगाश्च वियोगान्ता इति न देशादि- लाभोऽपि ॥ ८० ॥ अर्थ—जिसका संयोग होता है उसका वियोग तो निश्चय ही होगा फिर किसी स्थान में जाकर छोड़ा तो क्या मुक्ति हो सकती है ? किसी सूरत में नहीं । इसी तरह जब प्रकृति और पुरुष का संयोग है तो वियोग भी जरूर होगा, फिर उसमें देश

( १५२ ) की क्या ज़रूरत है, क्योंकि स्थान के प्राप्त होने से मुक्ति तो हो ही नहीं सकती । नभागियोगो भागस्य ॥ ८१ ॥ अर्थ-प्रधान के भाग ( अंश ) जो महत्तत्वादिक हैं उन- का भागी ( प्रधान ) में मिल जाना ही मुक्ति है, सो भी नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो उसमें मिलते ही हैं । नाणिमादियोगोऽप्यवश्यंभावित्वात् तदुच्छिते- रितरयोगवत् ॥ ८२ ॥ अर्थ-पुरुष के योग से अणिमादि ऐश्वर्य्यों का योग होना भी प्रधान की मुक्ति का लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि जिसका योग है उसका वियोग तो अवश्य ही होगा, जैसाकि दूसरे पदार्थों में मालूम होता है । नेन्द्रादिपदयोगोऽपितद्वत् ॥ ८३ ॥ अर्थ-पुरुष के संयोग से इन्द्रादि पद की प्राप्ति का होना प्रधान की मुक्ति का लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि वह सब नाशवान् हैं । अब “अहङ्कारिकश्रुतेर्नभौतिकानि” इस सूत्र में जो वात सूक्ष्म रीति से कही है उसको कहते हैं- न भूतप्रकृतित्वमिन्द्रियाणामाहं कारिकत्व- श्रुतेः ॥ ८४ ॥ अर्थ-जो बात पृथिवी आदि भूतों में विद्यमान है वह बात इन्द्रियों में नहीं दीखती, इसवास्ते इन्द्रियों को भौतिक नहीं कह सकते, किन्तु अहङ्कार से पैदा हुई हैं । प्र०-सांख्य के मत के अनुसार प्रकृति और पुरुष का ज्ञान होना ही मुक्ति का हेतु है; किन्तु वैशेषिकादिकों ने जो छः पदार्थ माने हैं उनके ज्ञान से मुक्ति क्यों नहीं हो सकती ?