भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 17

( १६ ) अर्थ—यदि कारण को नियत न मानकर पूर्वभावमात्र ही माना जावे तो यह नियम न रहेगा कि मृत्तिका ही से घट बनता है और वायु से नहीं बनता; क्योंकि क्षणिकवादी किसी विशेष कारण को भाव से तो मानते नहीं, किन्तु भाव ही मानेंगे। अतएव उपरोक्त दोष बना रहेगा और निमित्त कारण और उपादान का अन्तर भी मालूम नहीं होगा और लोक में उपादान कारण और निमित्त कारण का भेद निश्चित है, इसलिये क्षणिकवाद ठीक नहीं। प्र०—जो कुछ संसार में है, सब मिथ्या ही है, और संसार में होने से बन्धन भी मिथ्या है, अतएव उसका कारण खोजने की कोई आवश्यकता नहीं, वह स्वयम् नाशरूप है ? उ०—न विज्ञानमात्रं बाह्यप्रतीतेः ॥ ४२ ॥ अर्थ—इस जगत् को केवल मिथ्याज्ञान या विज्ञानमात्र नहीं कह सकते; क्योंकि ज्ञान आन्तरिक अर्थात् भीतर ही होता है और जगत् बाहर और भीतर दोनों दशाओं में प्रकट है। प्र०—जब हम बाहर किसी पदार्थ के भाव को मानते ही नहीं केवल भीतर के विचार ही मनोराज्य का सृष्टि की भाँति मालूम होते हैं ? उ०—तद्भावे तद्भावाच्छून्यं तर्हि ॥ ४३ ॥ अर्थ—यदि तुम जगत् को बाह्य न मानो केवल भीतर ही मानोगे तो इस दीखते हुए संसार में विज्ञान का भी अभाव मानना पड़ेगा और जगत् को शून्य कहना पड़ेगा। इसका कारण यह है कि प्रतीति विषय का साधन करने वाली होती है, इसलिये यदि बाह्य प्रतीत जगत् का साधन न करे तो विज्ञान प्रतीत भी विज्ञान को नहीं सिद्ध कर सकती, इस हेतु से विज्ञानवाद में शून्यबाद होजायगा । प्र०—अब शून्यवादी नास्तिक अपनी दलील देता है?