सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १७ ) शून्यं तत्वं, भावो विनश्यति वस्तुधर्मत्वाद्वि- नाशस्य ॥ ४४ ॥ अर्थ—जितने पदार्थ हैं सब शून्य हैं, और जो कुछ भाव हैं, वह सब नाशवान् हैं, और जो विनाशी है वह स्वप्न की भांति मिथ्या है। इससे सम्पूर्ण वस्तुओं के आदि और अंत का तो अभाव सिद्ध ही होगया। अब रहा केवल मध्यभाग सो यथार्थ नहीं-तब कौन किस को बाँध सकता है ? और कौन छोड़ सकता है ? इस हेतु से बन्ध मिथ्या ही प्रतीत होता है। विद्यमान वस्तुओं का नाश इसलिये है कि नाश होना वस्तुमात्र का धर्म है। इस शून्यवादी के पूर्वपक्ष का खण्डन करते हैं। उ०—अपवादमात्रम बुद्धानाम् ॥ ४५ ॥ अर्थ—'जो कुछ भाव पदार्थ हैं वह सब नाशवान् हैं', यह कथन मूर्खों का अपवादमात्र है; क्योंकि नाशमात्र वस्तु का स्वभाव कहकर, नाश में कुछ कारण न बताने से जिन पदार्थों का कुछ अवयव नहीं है उनका नहीं कह सकते। इसका हेतु यह है कि कारण में लय हो जाने को ही नाश कहते हैं, और जब निरवयव वस्तुओं का कुछ कारण न माना तो उनका लय किसी में न होने से उनका नाश न हो सकेगा। इसके सिवाय एक और भी दोष रहेगा कि हर एक कार्य का अभाव लोक में नहीं कह सकते; जैसे—"घट टूट गया," इस कहने से यह ज्ञात होगा, कि घट की दूसरी दशा हो गई; परन्तु घटरूपी कार्य तो बना ही रहा। आकृति को इस हेतु से माना कि वह एक घट के टूट जाने से दूसरे घटों में तो रहती है। अब तीनों लक्षणों का खण्डन करते हैं, अर्थात्—विज्ञानवादी क्षणिकवादी और शून्यवादी ।