भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १८ ) उभयपक्षसमानक्षेमत्वादयमपि ॥ ४६ ॥ अर्थ—जिस प्रकार क्षणिकवादी और विज्ञानवादी का मत प्रत्यभिज्ञादि दोष वाह्य प्रतीति से खण्डित हो जाता है, इसी प्रकार शून्यवादी का मत भी खण्डित हो जाता है; क्योंकि उस दशा में पुरुषार्थ का बिलकुल अभाव हो जाता है। यदि यह कहो कि शून्यवाद करने पर भी पुरुषार्थ तो स्वीकार करते हैं, तो वह भी मानना अयुक्त होगा। अपुरुषार्थत्वमुभयथा ॥ ४७ ॥ अर्थ—शून्यवादी के मत में पुरुषार्थ अर्थात् मुक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जब दुःख है ही नहीं केवल शून्य ही है तो उसकी निवृत्ति का उपाय क्यों किया जावे और मुक्ति भी शून्य हो होगी उसके लिये साधन भी शून्य ही होंगे, तो ऐसे शून्य पदार्थ के लिये पुरुषार्थ भी शून्य ही होगा। अतएव शून्यवादी का मत किसी प्रकार भी शान्तिदायक नहीं और न उससे मुक्ति हो सकती है। न गतिविशेषात् ॥ ४८ ॥ अर्थ—गति के ३ अर्थ हैं—ज्ञान, गमन, प्राप्ति। यह तीनों बन्धन का हेतु नहीं होते। पहिले जब कहा जावे कि ज्ञान विशेष से बन्धन होता है। ज्ञान तीन प्रकार का है—प्रातिभासिक, व्याव- हारिक, पारमार्थिक। यदि कहा जावे कि प्रातिभासिक सत्ता के ज्ञान से बन्धन होता है तो यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्रातिभाविक सत्ता का ज्ञान इन्द्रिय और संस्कार-दोष से उत्पन्न होता है, परन्तु आत्मा में न इन्द्रिय है न संस्कार है; इसलिये जिसका कारण है ही नहीं उसका कार्य कैसे हो सकता है। और रहा व्यावहारिक ज्ञान, सो तो बद्ध अवस्था को छोड़ रहता ही