भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १६ ) नहीं, वह बन्ध का कारण किस प्रकार हो सकता है । और पारमार्थिक ज्ञान तो मुक्ति का हेतु है, वह बन्ध का कारण क्योंकर हो सकता है, अतएव ज्ञानविशेष से बन्ध नहीं होता । दूसरा गमन शरीरादि में होता है, वह जीव का स्वाभाविक धर्म होने से बन्ध का हेतु नहीं हो सकता । तीसरा प्राप्ति, सो प्राप्त होने वाले दो पदार्थ हैं—एक ब्रह्म, दूसरी प्रकृति, सो यह दोनों व्यापक होने से जीव को सर्वदा प्राप्त, सदैव रहनेवाली वस्तु से सदैव सम्बन्ध, उससे भी बद्ध नहीं हो सकता, अतएव गतिविशेष से बन्ध नहीं होता । निष्क्रयस्य तदसम्भवात् ॥ ४६ ॥ अर्थ—क्रिया से शून्य जड़ प्रकृति में भी गति असम्भव है और व्यापक ब्रह्म में भी गति असम्भव है, और यदि जीव की गति पर विचार किया जावे तो प्रश्न यह उपस्थित होगा, कि जीव विभु है अथवा मध्यम परिणामवाला है अथवा अणु है ? यदि विभु मानलें तो गति हो नहीं सकती । यदि मध्यम परिणाम- वाला मानलें तो यह दोष होगा । प्र०—क्या आत्मा अंगुष्ठमात्र नहीं है ? यदि अंगुष्ठमात्र है तो उसमें गति इत्यादि सम्भव है। यदि विभु है तो जाना हो ही नहीं सकते ? उ०—मूर्तत्वाद् घटादिवत् समानधर्मापत्ता- वपसिद्धान्तः ॥ ५० ॥ अर्थ—आत्मा के मूर्त्तिमान् होने से घटादिकों की भाँति सावयव इत्यादि दोष आजायेंगे और सावयव होने से संयोग वियोग अर्थात् उत्पत्ति और नाश भी मानना पड़ेगा । जोकि आत्मा नित्य है, इसलिये मूर्त्तिवाला नहीं हो सकता और जब

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