भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( २० ) मूर्त्तिवाला नहीं तो उसमें इस प्रकार की गति भी नहीं मानी जा सकती। अतएव आत्मा को मूर्त्तिवाला मानना सिद्धान्त का खण्डन करना है। गतिश्रुति रप्युपाधियोगादाकाशवत् ॥ ५१ ॥ अर्थ—शरीर के सब अवयवों में जो गति है अर्थात् दूसरे शरीरों में जो गमन है वह सूक्ष्म शरीर रूप उपाधि के कारण है, अर्थात् जब तक सूक्ष्म शरीर न हो तब तक एक शरीर छोड़ कर दूसरे शरीर में नहीं जा सकता, जैसे—आकाश घट की उपाधि से चलता है, क्योंकि घट में जो आकाश है जहाँ घट जायगा साथ हो जायगा। प्र०—सूक्ष्म शरीर किसे कहते हैं ? उ०—पंच प्राण, पंच उपप्राण, पंच ज्ञानेन्द्रिय, मन, अहंकार ; इन सबके समूह का नाम सूक्ष्म शरीर है। प्र०—क्या यह जीव से बिलकुल पृथक् हैं ? उ०—हाँ, बिलकुल पृथक् हैं। प्र०—तो पहिले-पहल जीव किस प्रकार इस शरीर को धारण करता है ? उ०—पहिले सांकल्पिक सृष्टि में आता है, फिर उसका जब सूक्ष्म शरीर से सम्बन्ध हो जाता है, तब दूसरे शरीरों में जाता है। यदि सम्बन्ध न हो तो नहीं जाता। न कर्म्मणाप्यतद्धर्मत्वात् ॥ ५२ ॥ अर्थ—कर्म्म से भी बन्धन नहीं होता, क्योंकि वह भी शरीर सहित आत्मा में होता है और शरीर सुख दुःख भोगने से होता है। इसलिये कर्म्म से पहिले शरीर का होना आवश्यक