भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १७४ ) अर्थ—जैसे औषधियों की सिद्धि होती है अर्थात् एक-एक औषध से अनेक रोगों की शान्ति होती है, इसी तरह योग की सिद्धियों को भी जानना चाहिये । कपिलाचार्य पुरुष को चैतन्य मानते हैं, अतएव जो पृथिवी आदि भूतों को चैतन्य मानते हैं उनके मत को दोषयुक्त ठहरा कर अध्याय को समाप्त करते हैं । न भूतचैतन्यं प्रत्येकादृष्टेः सांहत्येऽपि च सांह- त्येऽपि च ॥ १२६ ॥ अर्थ—मिलने पर भी भूतों में चैतन्य नहीं हो सकता । यदि उनमें चेतनता होती तो उनके अलग-अलग होने पर भी दीखती ; किन्तु पृथक् होने पर उनको जड़ दीखते हैं तो चेतन कैसे मानें ? “सांहत्येपि च” ऐसा दो बार कहना अध्याय की समाप्ति का सूचक है । इति सांख्यदर्शने पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः । षष्ठोऽध्याय पहिले पांच अध्यायों में महर्षि कपिलजी ने अनेक प्रकार के प्रमाण और युक्तियों से अनेक मत का प्रतिपादन और अन्य मतों का खण्डन किया । अब इस अन्त के छठे अध्याय में अपने सिद्धान्त को बहुत सरल रीति पर कहेंगे कि जिससे इस दर्शन- शास्त्र का सार बिना प्रयास अर्थात् थोड़ी मेहनत से ही समझ में आसके और जो बातें पहिले अध्यायों में कह आये हैं अब