सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १७५ ) उन बातों को ही साररूप से कहेंगे कि जिससे इस दर्शन का सम्पूर्ण सार साधारण मनुष्यों की समझ में भी आजाया करे ( या आजावे ) ; इसलिये उन बातों का पुनः कहना पुनरुक्ति नहीं हो सकता है । अस्त्यात्मा नास्तित्वसाधनाभावात् ॥ १ ॥ अर्थ—आत्मा कोई पदार्थ अवश्य है, क्योंकि न होने में कोई प्रमाण नहीं दीखता । देहादिव्यतिरिक्तोऽसौ वैचित्र्यात् ॥ २ ॥ अर्थ—आत्मा देहादिकों से भिन्न पदार्थ है, क्योंकि उस आत्मा में विचित्रता है । षष्ठीव्यपदेशादपि ॥ ३ ॥ अर्थ—मेरा यह शरीर है, इस षष्ठीव्यपदेश से भी आत्मा का देह से भिन्न पदार्थ होना सिद्ध है । यदि देहादिक ही आत्मा होते तो मेरा यह शरीर है ऐसा कहना नहीं हो सकता था । ऐसे कहने से ही प्रतीत होता है कि 'मेरा यह' कोई और वस्तु है, यह शरीर कोई और पदार्थ है, एक नहीं । न शिलापुत्रवद्धर्मिग्राहकमानबाधात् ॥ ४ ॥ अर्थ—शिला के पुत्र का शरीर है, इस प्रकार यदि षष्ठी का अर्थ किया जावे तो भी ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि धर्मिग्राहक अनुमान से बाध की प्राप्ति आती है । ( भाव इसका यह है कि ) यदि ऐसा कहा जाय कि पत्थर का पुत्र अर्थात् जो पत्थर है वही पत्थर का पुत्र है, इसमें कोई भी भेद नहीं दीखता । इसी प्रकार जो आत्मा है वही शरीर है, ऐसा यदि षष्ठी का अर्थ किया जावे तो भी ठीक नहीं हो सकता ; क्योंकि ऐसा कोई प्रमाण