सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १७६ ) देखने में नहीं आता जो शिला में पिता पुत्र के भाव को सिद्ध करता हो। अत्यन्तदुःखनिवृत्याकृतकृत्यता ॥ ५ ॥ अर्थ—दुःख के अत्यन्त निवृत्त होने से अर्थात् बिलकुल दूर होने से मोक्ष होता है। यथा दुःखात् क्लेशः पुरुषस्य न तथा सुखाद- भिलाषः ॥ ६ ॥ अर्थ—जिस प्रकार पुरुष को दुःखों से क्लेश होता है उसी प्रकार सुख से उसकी अभिलाषा नहीं होती अर्थात् सुखों से अभिलाषाओं का पूरा होना नहीं होता ; क्योंकि सुख भी प्रायः दुःखों से मिले हुये हैं। न कुत्रापि कोऽपि सुखीति ॥ ७ ॥ अर्थ—कहीं पर भी कोई सुखी नहीं दीखता, किन्तु सुखी दुःखी दोनों प्रकार से दीखते हैं। तदपि दुःखशबलमिति दुःखपक्षे निःक्षिपन्ते विवेचकाः ॥ ८ ॥ अर्थ—यदि किसी प्रकार कुछ थोड़ा-बहुत सुख प्राप्त भी हुआ तो भी सुख-दुःख के निश्चय करनेवाले विद्वान लोग उस सुख को भी दुःख में गिनते हैं, क्योंकि उस में भी दुःख मिले हुये होते हैं; जैसे—विष का मिला हुआ मिष्ट पदार्थ ( मीठी चीज़ ) ; इस वास्ते सांसारिक सुख को छोड़कर मोक्ष-सुख के वास्ते उपाय करना चाहिये।