सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें--- अर्थ- ऊ . . . न किया वह योग्य नहीं, क्योंकि वेदों म अनन्ता . . . को भी पुनरावृत्ति लिखी है कि मुक्त फिर लौट आता है । शङ्कराचार्य ने भी इस श्रुति का अर्थ इस कल्प में लौटना माना है ; इसलिये मुक्ति से फिर बँधता नहीं, ऐसा कहना योग्य नहीं हो सकता । दूसरा यह जो दोष कहा कि पुनर्बन्ध होने से बद्ध मुक्त दोनों बराबर हो जायेंगे, सो भी योग्य नहीं ; क्योंकि जो मनुष्य रोगी है उसकी बराबरी नीरोगी के साथ किसी प्रकार नहीं हो सकती और जो नीरोगी है वह भी कालान्तर ( कुछ दिनों के बाद ) में रोगी हो सकता है ; परन्तु यह विचार करके यह भविष्यत् ( अगाड़ी के समय में ) रोगी होगा, अतः रोगी के ही बराबर है, उसके साथ भी रोगी का-सा व्यवहार नहीं कर सकते । इसलिये न तो मुक्त की पुनरावृत्ति मानने से श्रुति से विरोध प्राप्त होता है और न युक्ति से ही विरोध होता है । अधिकारित्रैविध्यान्न नियमः ॥ २२ ॥ अर्थ—उत्तम, मध्यम, अधम, तीन प्रकार के अधिकारी होते हैं, इस कारण यह कोई नियम नहीं है कि श्रवण, मनन आदि संयोगों से सबही की मुक्ति हो । दाढर्यार्थमुत्तरेषाम् ॥ २३ ॥ अर्थ—जो अज्ञ हैं उनको दृढ़ता के लिये उचित है कि श्रवण, मनन आदि योग के अंगों का अनुष्ठान करें तो कुछ दिनों के बाद मुक्ति को प्राप्त हो सकेंगे। स्थिरसुखमासनमिति न नियमः ॥ २४ ॥ अर्थ—जिसमें सुख स्थिर हो वोही आसन है, इस बात को