सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८१ ) पहिले कह आये हैं, अतः पद्मासन, मयूरासन इत्यादिक भी मोक्ष के साधन हैं, या योग के अङ्गों में उनकी गिनती है, यह नियम नहीं है। ध्यानं निर्विषयं मनः ॥ २५ ॥ अर्थ—जिसमें मन निर्विषय हो जाय उसी का नाम ध्यान है, और यह ध्यान ही समाधि का लक्षण है। अब समाधि और सुषुप्ति के भेद को दिखाते हैं। उभयथाप्यविशेषश्चैन्नैवमुपरागनिरोधाद्विशेषः२६ अर्थ—समाधि और सुषुप्ति इन दोनों में अविशेष अर्थात् समानता है, ऐसा नहीं कहना चाहिये। क्योंकि समाधि में उपराग ( विषय-वासना ) को रोकना पड़ता है, इसलिए सुषुप्ति की अपेक्षा समाधि विशेष है। निःसंगेऽप्युरागोऽविवेकात् ॥ २७ ॥ अर्थ—यद्यपि पुरुष निःसंग है तथापि अविवेक के कारण उसमें विषयों की वासनाएं मननी चाहियें। जवास्फटिकयोखिनोपरागःकिन्त्वभिमानः॥२८॥ अर्थ—जैसे जवा का फूल और स्फटिकमणि को धोरे रखने से उपराग होता है, वैसा उपराग पुरुष में नहीं है, किंतु अविवेक के कारण से पुरुष में विषय-वासनाओं का अभिमान कहना चाहिये। ध्यानधारणाभ्यासवैराग्यादिभिस्तन्निरोधः ॥२९ अर्थ—ध्यान, धारणा, अभ्यास, वैराग्य आदिकों से विषय- वासनाओं का निरोध ( रुकावट ) हो सकता है।