सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८६ ) चुके हैं कि बिना जीव के सिर्फ वायु ही से शरीर का कार्य नहीं चलता, उसपर आचार्य अपना सिद्धान्त कहते हैं। अनधिष्ठितस्यपूतिभावप्रसङ्गात्तत्सिद्धिः ॥६०॥ अर्थ-यदि आत्मा इस शरीर का अधिष्ठाता न हो, तो शरीर में दुर्गन्ध आने लगे, इस कारण प्राण को शरीर का अधिष्ठाता नहीं कह सकते हैं। अदृष्टद्वारा चेदसम्बद्धस्य तदसम्भवाज्जलादि- वदङ्कुरे ॥६१॥ अर्थ-यदि अदृष्ट (प्रारब्ध) से प्राण को शरीर का अधिष्ठाता कहें तो भी योग्य नही ; क्योंकि प्राण का जब प्रारब्ध के साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है, तो उसको हम अधिष्ठाता कैसे कह सकते हैं ? जैसे अंकुर के पैदा होने में जल भी हेतु है, परन्तु बिना बीज के जल से अंकुर पैदा नहीं हो सकता, इसी तरह यद्यपि शरीर की अनेक क्रियायें प्राण से होती हैं तो भी वह प्राण बिना आत्मा के कोई क्रिया नहीं कर सकता। निर्गुणत्वात्तदसम्भवादहङ्कारधर्मा ह्येते॥६२॥ अर्थ--ईश्वर निर्गुण है, इस कारण उसको बुद्धि आदि का होना असम्भव (झूठ) है; इसवास्ते वह सब अहंकार के धर्म बुद्धि आदि जीव में ही मानने चाहियें। विशिष्टस्य जीवत्वमन्वयव्यतिरेकात् ॥६३॥ अर्थ-जो ईश्वर के गुणों से पृथक् शरीरादि युक्त हैं उस- को जीव संज्ञा से बोलते हैं, इस बात को अन्वय व्यतिरेक से