सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १६० ) जानना चाहिये, अर्थात् जीव के होने से शरीर में बुद्धि का प्रकाश और न होने से बुद्धि आदि का अप्रकाश दीखता है। अहंकार कर्त्तृधीना कार्यसिद्धिर्नैश्वराधीना प्रमाणाभावात् ॥६४॥ अर्थ—अहंकार ही धर्म आदि कार्यों का करनेवाला है, किन्तु धर्म को ईश्वर नहीं कराता ; क्योंकि यदि धर्मादि ईश्वर स्वयम् बनावे तो फल देना अन्याय हो जाय। अदृष्टोद्भू तिवत् समानत्वम् ॥६५॥ अर्थ—जिस वस्तु के कर्त्ता को हम प्रत्यक्ष नहीं देखते हैं उस कर्त्ता का हम अनुमान कर लेते हैं। दृष्टान्त—जैसे कि किसी घड़े को देखा और उसके कर्त्ता कुम्हार को नहीं देखा। तब अनुमान से मालूम करते हैं कि इसका बनाने वाला अवश्य है, चाहे वह दिखलाये नहीं। इसी प्रकार पृथिवी आदि अंकुरों का कर्त्ता भी कोई न कोई अवश्य है। महतोऽन्यत् ॥६६॥ अर्थ—इसी प्रकार इन्द्रियों की तन्मात्राओं का कर्त्ता भी महत्तत्व के सिवाय किसी को मानना चाहिये। वह कर्त्ता अहं- कार ही है। कर्मनिमित्तः प्रकृतेः स्वस्वामिभावोऽप्यनादि- बीजाङ्कुरवत् ॥६७॥ अर्थ—प्रकृति और पुरुष का स्वस्वामिभाव सम्बन्धी भी पुरुष के कर्मों की वासना से अनादि ही मानना चाहिये ; जैसे बीज और अंकुर का होना अनादि माना गया है।