भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( २३ ) प्रधानाविवेकादन्याविवेकस्य तद्धाने हानम् ॥ ५७ अर्थ—जीव में प्रधान अर्थात् प्रकृति के अविवेक अर्थात् पदार्थ ज्ञान के न होने से और कारण आदि से पदार्थों का अज्ञान होता है। आशय यह कि बन्धन का कारण जीव की अल्पज्ञता है, क्योंकि जीव अपनी स्वाभाविक अल्पज्ञता से प्रकृति का विवेक नहीं रखता, जिससे प्राकृतिक पदार्थों में मिथ्या ज्ञान उत्पन्न होता है, और मिथ्या ज्ञान से रागद्वेष और राग-द्वेष से प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, और उससे बन्धन अर्थात् तीन प्रकार का दुःख उत्पन्न होता है, और जिस समय प्रकृति का मिथ्या ज्ञान नष्ट हो जाता है तब प्रकृति के पदार्थों का अविवेक दूर होकर दुःख रूप बन्धन से छूट जाता है। वाङ्_मात्रं नतु तत्वं चित्तस्थितेः ॥ ५८ ॥ अर्थ—दुःखादि को चित्त में रहनेवाला होने से उनका पुरुष में कथनमात्र ही है; जैसे—लाल डाँक के लगाने से अँगूठी का हीरा लाल मालूम होता है, ऐसे जीव मन के दुःखी होने से दुःखी मालूम होता है, और मन के सुखी होने से सुखी मालूम होता है, वास्तव में सुख दुःख से पृथक् है। प्र०—यदि इस भाँति दुःख कथनमात्र ही है, तो युक्ति से भी दूर हो जायगा, उसके लिये विवेक की क्या आवश्यकता है, इसका उत्तर अगले सूत्र में देते हैं ? युक्तितोऽपि न बाध्यते दिङ्_मूढवदपरोक्षादृते ५६ अर्थ—इस केवल कथनमात्र दुःख का भी युक्ति से नाश नहीं हो सकता, बिना अपरोक्ष ज्ञान के। जैसे किसी मनुष्य को पूर्व दिशा में उत्तर का भ्रम हो जावे तो जब तक उसे पूर्व और