सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) किन्तु आत्मा के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी प्रतीत होती हैं । प्र०—क्या प्रकृति का कोई कारण नहीं है, ब्रह्म को कारण सुना जाता है ? उ०—ब्रह्म जगत् का निमित्त-कारण है । प्रकृति का उपादान कारण नहीं । प्र०—प्रकृति को क्यों अकारण मानते हो ? उ०—मूले मूला भावादमूलं मूलम् ॥ ६७ ॥ अर्थ—२२ तत्त्वों का मूल उपादान कारण प्रकृति है, और मूल अर्थात् जड़ की जड़ नहीं होती, इसवास्ते मूल बिना मूल के ही होता है । प्र०—प्रकृति को मूल क्यों मानते हो ? उ०—यदि मूल का मूल मानोगे, तो उसके मूले की भी आ- वश्यकता होगी । इस प्रकार अनवस्था आजायगी । प्र०—जैसे घट का कारण मृत्तिका है, और मृत्तिका का कारण परमाणु है ? उ०—पारम्पर्येऽप्येकत्र परिनिष्ठेति संज्ञा- मात्रम् ॥ ६८ ॥ कारणों की परम्परा के विचार से परमाणु ही घट का कारण है, मृत्तिका तो नाममात्र है । समानः प्रकृतेर्द्वयोः ॥ ६६ ॥ घट और मृत्तिका के साथ प्रकृति का समान सम्बन्ध है, अर्थात् परम्परा से प्रकृति ही घट और मृत्तिका का कारण है, और निरवयव होने से नित्य है, उसका कोई कारण नहीं ।