भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( २६ ) अधिकारित्रैविध्यान्ननियमः ॥ ७० ॥ यद्यपि प्रकृति सबका उपादान कारण है; परन्तु प्रत्येक कार्य्य में जो तीन प्रकार के कारण माने जाते हैं अर्थात् ☸ १ उपादान, २ निमित्त, और ३ साधारण—इन की भी व्यवस्था न रहेगी, क्योंकि जब कुम्हार मिट्टी दण्डादि का कारण प्रकृति ही ठहरी, तो इन तीन कारणों की अनावश्यकता होने से बहुत गोलमाल हो जायगा। इस में हेतु यह है, कि फिर कोई भी किसी का निमित्त व असाधारण कारण न रहेगा, अतएव जहाँ-जहाँ कारणत्व कहा जाय, वहाँ-वहाँ प्रकृति को छोड़कर कहना चाहिये, क्योंकि प्रकृति तो सबका कारण है ही, उसके कहने की कोई भी आवश्यकता नहीं है; जैसे—कुम्हार के पिता को घट का कारण कहना अनावश्यक है, क्योंकि वह तो अन्यथा सिद्ध है। यदि वही न होता तो कुलाल कहां से आता ? परन्तु घट के बनने में कुलाल के पिता की कोई भी आवश्यकता नहीं है, ऐसा ही नवीन नैयायिक भी मानते हैं, कि कारणत्व प्रकृति को छोड़कर कहना चाहिये। ☸ १ उपादान कारण, जैसे घट का मृत्तिका। २ निमित्त कारण, जैसे घट का कुलाल। ३ साधारण, जैसे घट के दण्ड आदि। महदाख्यमाद्यं कार्य्यं तन्मनः ॥ ७१ ॥ अर्थ—प्रकृति का पहिला कार्य महत् है, और वह मन कहलाता है। मन से अहङ्कारादि उत्पन्न होते हैं, मन की उत्पत्ति ६१ सूत्र में कहचुके हैं। चरमोऽहङ्कारः ॥ ७२ ॥ अर्थ—और प्रकृति का दूसरा कार्य अहङ्कार है। इन तीनों सूत्रों का अभिप्राय यह है कि यदि प्रकृति को कारणत्व