सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३० ) कहा जावे, तो केवल इन्हीं दो कार्यों का कहना अन्य कार्यों का कारण महदादि को कहना चाहिये। इसी बात को अगले सूत्रों से स्पष्ट करते हैं। तत्कार्यत्वमुत्तरेषाम् ॥ ७३ ॥ अर्थ—महत् और अहङ्कार को छोड़ बाक़ी सब प्रकृति के कार्य नहीं, किन्तु उनके कारण महदादि हैं। प्र०—जब तुमने पहिले इसको प्रकृति का कार्य कहा, अब उसे अलग करते हो, कि औरों को महदादिकों का कार्य कहना चाहिये। अब यहाँ यह सन्देह होता है, कि पहिले प्रकृति को सबका कारण कहचुके। अब महदादिकों को क्यों कारण कहते हैं ? तो इसका उत्तर यह है कि— उ०—आद्यहेतुता तद्द्वारा पारम्पर्येऽप्यणुवत् ७४ अर्थ—जिस प्रकार परम्परा सम्बन्ध से घटादि के कारण अणु माने थे, उसी भाँति परम्परा सम्बन्ध से महदादिकों का कारण भी प्रकृति ही है, अतएव कुछ दोष न रहेगा। पूर्वभावित्वे द्वयोरेकतरस्य हानेऽन्यतरयोगः ७५ अर्थ—पहिले होने में एक यह भी युक्ति है, कि कार्य नाश होकर कारण में मिल जाता है, और अन्त में सब कार्य पदार्थ प्रकृति में लय हो जाते हैं। यदि कोई शङ्का करे कि जब प्रकृति और पुरुष दोनों कार्य जगत् से पहिले थे, तो अकेली प्रकृति को क्यों कारण माना जावे ? इसका उत्तर यह है कि पुरुष परिणामी नहीं और उपादान कारण का परिणाम ही कार्य कहलाता है, और पुरुष के अपरिणामी होने में १५-१६ के सूत्र प्रमाण हैं। यदि प्रकृति