सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३१ ) सम्बन्ध से प्रकृति द्वारा पुरुष में परिणाम मानें और दोनों को कारण मानें तो वृथा गौरव होगा। प्र०—कारण से उपादान-कारण का क्यों ग्रहण करते हो, निमित्त को क्यों नहीं लेते ? उ०—उपादान-कारण के गुण ही कार्य में रहा करते हैं। हमें जगत् में जिस आनन्द की खोज है, यदि वह जगत् के कारण में होगा तो मिलेगा अन्यथा पुरुषार्थ निरर्थक जायगा ; इसलिये विवेक के लिये उपादान कारण की ही आवश्यकता है। प्र०—प्रकृति एक-देशी है वा व्यापक ? परिच्छिन्नं न सर्वोपादानम् ॥ ७६ ॥ उ०—एक-देशी और अनित्य पदार्थ सर्व जगत् का उपादान कारण नहीं हो सकते ; क्योंकि अनित्य पदार्थ को कार्य होने से स्वयम् कारण की आवश्यकता है। प्र०—एक देशी पदार्थ की उत्पत्ति में क्या प्रमाण है ? उ०—तदुत्पत्तिश्रुतेश्च ॥ ७७ ॥ अनित्य और एक-देशी पदार्थों की उत्पत्ति श्रुति में मानी है और जिसकी उत्पत्ति है उसका विनाश अवश्य होगा। प्र०—अविद्या सम्बन्ध से जगदुत्पत्ति है, इस में क्या दोष है ? इसका उत्तर महात्मा कपिलजी यह देते हैं। नावस्तुनो वस्तुसिद्धिः ॥ ७८ ॥ उ०—जो अविद्या द्रव्य नहीं है केवल गुण मात्र है या कोई वस्तु नहीं है, उस से यह जगत् जो द्रव्य और वस्तु है, किस प्रकार उत्पन्न होसकता है ? क्योंकि गुण द्रव्य का एक अवयव होता है। एक अवयव से अवयवी की उत्पत्ति नहीं हो सकती और न