भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ३२ ) अभाव से भाव की उत्पत्ति होती है ; जैसे—मनुष्य के सींग नहीं तो उस सींग से कमान कैसे बन सकती है । प्र०—यह संसार भी अवस्तु है, इसवास्ते यह अविद्या से बना है ? अवाधाददुष्टकारणजन्यत्वाच्चनावस्तुत्वम् ॥ ७६ उ०—यदि कहो जगत् भी अवस्तु है, तो यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि न तो स्वप्न के पदार्थों के तुल्य जगत् का किसी अवस्था विशेष में बाध होता है, जैसे—स्वप्न के पदार्थों का जाग्रत अवस्था में बाध होजाता है, और न जगत् किसी इन्द्रिय के दोष से प्रतीत होता है, जैसे—पीलिया रोग की अवस्था में सब वस्तुओं. को पीला प्रतीत करता है परन्तु यह पीलापन सत्य नहीं जगत् । इस प्रकार के किसी दोषयुक्त कारण से उत्पन्न नहीं हुआ, इस कारण जगत् को अवस्तु नहीं कह सकते । प्र०—जब श्रुतियों में जगत् का मिथ्या होना कहा गया है तब जगत् वस्तु नहीं हो सकता ? उ०—क्या तुम श्रुति को जगत् के अन्दर मानते हो या बाहर । यदि अन्दर मानो तो जगत् के मिथ्या होने से श्रुति का स्वयं ही बाध होजायगा और वह मिथ्या श्रुति प्रमाण ही न रहेगी । यदि जगत् से बाहर मानो, तो अद्वैतवादी के सिद्धान्त की हानि होगी । प्र०—“नेति नेति” इस प्रकार की श्रुतियों का क्या अर्थ करोगे ? उ०—यह श्रुतियें ब्रह्म का जगत् से भेद याने भिन्नता को बताने वाली हैं और जगत् को स्वरूप से अवस्तु बतलाने वाली नहीं ।