सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३४ ) अर्थ—यह तो पहिले कह चुके हैं कि दृष्ट पदार्थों वा कर्म से दुखात्यन्त निवृत्ति नहीं होती। अब कहते हैं, कि ज्ञान के बिना वेदोक्त कर्म से भी मुक्ति नह होती ; क्योंकि वैदिक कर्मों से जो स्वर्गादि सुख मिलते हैं उनका भी नाश हो जाता है, इस वास्ते यह पुरुषार्थ नहीं। पहिले “न कर्मणा अन्य धर्मत्वात्” इस सूत्र में कर्म से बन्धन नहीं होता, इसका खण्डन किया गया था, अब कर्म से मुक्ति होती है इसका भी खण्डन कर दिया । प्र०—श्रुति में बतलाया गया है कि इस प्रकार के कर्म से ब्रह्मलोक कोँ प्राप्त होकर ब्रह्मलोक की आयु तक पुनरावृत्ति नहीं होती ? उ०—तत्रप्राप्तविवेकस्यानावृत्तिश्रुतिः ॥ ८३ ॥ अर्थ—इस श्रुति में भी प्राप्तविवेक ही के वास्ते वैदिक कर्मों से अनावृत्ति मानी गई है । यदि ऐसा न मानो तो दूसरी श्रुतियों से जो ब्रह्मलोक से पुनरावृत्ति का कथन करती हैं, विरोध होकर दोनों का प्रमाण नहीं रहेगा ; इसलिये प्राप्तविवेक ही से मुक्ति माननी चाहिये । दुःखाद् दुःखं जलाभिषेकवन्न जाड्यविमोकः ८४ अर्थ—जो कर्म शरीर से उत्पन्न होता है और शरीर वे न होने पर नहीं होता, इसवास्ते कर्म स्वयम् दुःख रूप य अविद्या स्वरूप है । जिस प्रकार दुःख से दुःख का नाश नई होता, उसी प्रकार कर्म से दुःख का नाश नहीं हो सकता, जैसे— जल में नहाने से शीत बढ़ता है, नाश नहीं होता, ऐसे ही विवेक रहित कर्म से मुक्ति नहीं होती । काम्येऽकाम्येऽपि साध्यत्वाविशेषात् ॥ ८५ ॥