भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ३५ ) अर्थ—चाहे कर्म निष्काम हो चाहे सकाम हो, परन्तु ज्ञान के बिना मुक्ति का साधन नहीं हो सकता ; क्योंकि दोनों प्रकार के कर्मों में साध्यत्व अर्थात् शरीर से उत्पत्तिवाली होना समान है, और श्रुति में भी लिखा है “न कर्मणा न प्रजया” इत्यादि अर्थात् न तो कर्म से मुक्ति होती, न प्रजा से, न धन से, ज्ञान के बिना किसी साधन से मुक्ति नहीं होती । प्र०—ज्ञान दुःख का विरोधी नहीं, इसलिये ज्ञान से दुःख का नाश कैसे हो सकता है ? उ०—दुःख जन्म-मरण से होता है ; जन्म-मरण कर्म से होते हैं, कर्म प्रवृत्ति से होता है, प्रवृत्ति राग-द्वेष से होती है, राग-द्वेष मिथ्याज्ञान से होते हैं, ज्ञान मिथ्या-ज्ञान का विरोधी है, जब मिथ्या ज्ञान का नाश ज्ञान से हो जायगा तब उसकी सन्तान को दुःखादि उत्पन्न ही नहीं होंगे । प्र०—जब ज्ञान को साधन मानोगे तो ज्ञान साध्य होने से भी मुक्ति दुःखरूप हो जायगी ; क्योंकि ज्ञान भी तो देहस्थ आत्मा ही को होगा और ज्ञान साध्य होने से मुक्ति ऐसी ही अनित्य होगी जैसा कर्म का फल है ? उ०—निजमुक्तस्य बन्धध्वंसमात्रं परं न समानत्वम् ॥ ८६ ॥ अर्थ—कर्म का फल तो भावरूप सुख है, इसलिये वह अनित्य है ; परन्तु ज्ञान का फल तो अविद्या का विनाश रूप है । जब कार्याभाव रूप नहीं तो उसका नाश न होगा । दूसरे कर्म देहात्मविशिष्ट से होता है और उसका फल भी देहात्मा मिलकर भोगते हैं, परन्तु देह विनाशी है, इसलिये कर्म का फल भी विनाशी ज्ञानात्मा का धर्म आत्मा में नित्य हो सकता है ।