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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( ३५ ) अर्थ—चाहे कर्म निष्काम हो चाहे सकाम हो, परन्तु ज्ञान के बिना मुक्ति का साधन नहीं हो सकता ; क्योंकि दोनों प्रकार के कर्मों में साध्यत्व अर्थात् शरीर से उत्पत्तिवाली होना समान है, और श्रुति में भी लिखा है “न कर्मणा न प्रजया” इत्यादि अर्थात् न तो कर्म से मुक्ति होती, न प्रजा से, न धन से, ज्ञान के बिना किसी साधन से मुक्ति नहीं होती । प्र०—ज्ञान दुःख का विरोधी नहीं, इसलिये ज्ञान से दुःख का नाश कैसे हो सकता है ? उ०—दुःख जन्म-मरण से होता है ; जन्म-मरण कर्म से होते हैं, कर्म प्रवृत्ति से होता है, प्रवृत्ति राग-द्वेष से होती है, राग-द्वेष मिथ्याज्ञान से होते हैं, ज्ञान मिथ्या-ज्ञान का विरोधी है, जब मिथ्या ज्ञान का नाश ज्ञान से हो जायगा तब उसकी सन्तान को दुःखादि उत्पन्न ही नहीं होंगे । प्र०—जब ज्ञान को साधन मानोगे तो ज्ञान साध्य होने से भी मुक्ति दुःखरूप हो जायगी ; क्योंकि ज्ञान भी तो देहस्थ आत्मा ही को होगा और ज्ञान साध्य होने से मुक्ति ऐसी ही अनित्य होगी जैसा कर्म का फल है ? उ०—निजमुक्तस्य बन्धध्वंसमात्रं परं न समानत्वम् ॥ ८६ ॥ अर्थ—कर्म का फल तो भावरूप सुख है, इसलिये वह अनित्य है ; परन्तु ज्ञान का फल तो अविद्या का विनाश रूप है । जब कार्याभाव रूप नहीं तो उसका नाश न होगा । दूसरे कर्म देहात्मविशिष्ट से होता है और उसका फल भी देहात्मा मिलकर भोगते हैं, परन्तु देह विनाशी है, इसलिये कर्म का फल भी विनाशी ज्ञानात्मा का धर्म आत्मा में नित्य हो सकता है ।

( ३६ ) प्र०—क्या आत्म निज मुक्त है ? उ०—अविद्यादि दोषों से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसके दूर होने से जीवात्मा मुक्ति सुख को लेता है। यहाँ आचार्य ऋषि का यह आशय है कि स्वभाव से तो जीवात्मा बद्ध नहीं केवल अविवेक से बद्ध होता है और अविवेक के नाश से मुक्त होता है, तो मुक्ति ध्वंस अर्थात् नाशरूप है, भावरूप नहीं। द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थ परिच्छित्तिः प्रमा तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं प्रमाणम् ॥ ८७ ॥ अर्थ—ज्ञाता और ज्ञेय के पास-पास होने से जो ज्ञान होता है, उसे प्रमा कहते हैं। इस प्रमा के साधन तीन प्रकार के प्रमाण हैं—एक प्रत्यक्ष, दूसरा अनुमान, तीसरा शब्द। जो पदार्थ भौतिक और नजदीक हैं, उनका ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण से होता है, और जो पदार्थ अभौतिक तथा दूर हैं, उनका शब्द और अनुमान से होता है, यहाँ दूर का आशय परोक्ष है। जिन पदार्थों का तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उनका शब्द प्रमाण से बोध होता है। यहाँ शब्द का आशय योगी और ईश्वर की आज्ञा है। जहाँ भौतिक पदार्थों का परोक्ष होने में शब्द प्रमाण लिया गया है, वहाँ सत्यवादी आप्त पुरुष का वाक्य समझना चाहिये। प्र०—एक शब्द प्रमाण के दो अर्थ क्यों लिये जावें ? उ०—शब्द कहते हैं आप्त के वाक्य को और आप्त कहते हैं जिसने धर्म से धर्मों का निश्चय किया हो, सो अभौतिक पदार्थों का यथार्थ ज्ञान तो बिना परमात्मा और योगी के दूसरे को हो नहीं सकता और भौतिक पदार्थों के ज्ञान के साधन इन्द्रियों के होने से आप्त पुरुष का वाक्य भी प्रमाण मानना चाहिये। प्र०—क्या यह तीन ही प्रमाण हैं उपमानादि नहीं ?

( ३७ ) उ०—तत्सिद्धौ सर्वसिद्धेर्नाधिक्यसिद्धिः॥८८॥ अर्थ—इन तीन प्रमाणों के सिद्ध होने से सब पदार्थों की सिद्धि हो जाती है, इसलिये और प्रमाण माँगने की आवश्यकता नहीं ; क्योंकि महात्मा मनु ने भी लिखा है । प्रत्यक्षञ्चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् । त्रयं सुविदितं कार्य्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता । अर्थ—प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र के अनुकूल जानकर कार्य करना चाहिये ; क्योंकि धर्म की शुद्धि की इच्छावालों की इच्छा इनसे पूरी होसकती है और उपमानादि प्रमाण इन्हीं के अन्दर आजाते हैं । यत्सम्बद्धं सत्तदाकारोल्लेखि विज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् ॥ ८९ ॥ जिस सामने उपस्थित पदार्थ के साथ ज्ञानेन्द्रिय का सम्बन्ध हो और मन को भी उस इन्द्रिय के द्वारा उसका यथार्थ बोध होजाय, तो उसे प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और इस ज्ञान का कारण ज्ञानेन्द्रिय और मन की वृत्ति है । इसलिये मन और इन्द्रियें प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाती हैं और इनका विषय केवल प्राकृत पदार्थ ही हैं । प्रत्यक्ष से अप्राकृत पदार्थों का ज्ञान नहीं होसकता । प्र०—योगियों को तीनों काल के पदार्थों का साक्षात ज्ञान हो सकता है और योगी समाधि अवस्था में आत्मा और अन्दर के पदार्थों को प्रत्यक्ष करता है, इस वास्ते तुम्हारा प्रत्यक्ष का लक्षण ठीक नहीं ? उ०—योगिनामबाह्यप्रत्यक्षत्वान्नदोषः ॥ ९० ॥

( ३८ ) अर्थ—यह लक्षण बाह्य प्रत्यक्ष का है और योगियों को अबाह्य प्रत्यक्ष भी होता है, इसलिये योगियों का प्रत्यक्ष बाह्य रूप न होने से दोष नहीं। इसके लिये और युक्ति देते हैं। लीनवस्तु लब्धातिशयसम्बन्धादऽदोषः ॥ ९१ ॥ योगी लोग ऐसी वस्तु का जो दूर हो अथवा दूसरे के चित्त में हो उसके साथ भी सम्बन्ध रखते हैं, इस वास्ते योगियों के ऐसे प्रत्यक्ष में दोष नहीं आता। प्र०—योगियों का ऐसा प्रत्यक्ष क्यों माना जावे ? क्योंकि यह साध्य अर्थात् प्रमाण की आवश्यकता रखता है, इसलिये इन्द्रियग्राह्य पदार्थ का ही प्रत्यक्ष मानना चाहिए और अतीन्द्रिय पदार्थ का प्रत्यक्ष न कहना चाहिए। उ०—मन के इन्द्रिय होने से मानसिक प्रत्यक्ष भी मानना चाहिए, इसलिये मानसिक प्रत्यक्ष जो योगियों को होता है वह सिद्ध है साध्य नहीं। प्र०—प्रमाण वह होता है जो सबके लिये एक सम हो, जो प्रत्यक्ष योगियों को हो अन्य पुरुषों को न हो, उसे प्रत्यक्ष नहीं कह सकते ? उ०—इन्द्रियों के विकारी होने से इन्द्रियजन्य ज्ञान किसी को भी नहीं होता, जैसे—अन्धे को रूप का ज्ञान, बहिरे को शब्द- ज्ञान इत्यादि। प्र०—क्या सबके मन में दोष है जो मानसिक प्रत्यक्ष नहीं होता ? उ०—जिसके मन में मल, विक्षेप, आवरण, तीन दोष हों उसे मानसिक प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, जैसे—दर्पण से अपनी आँख देख सकते हैं, परन्तु दर्पण के मैला तथा स्थिर न होने अथवा कोई आवरण होने से नहीं देख सकते। जैसे गंगा में यह शक्ति है कि

( ३६ ) वह बड़े-बड़े मकानों को बहा ले जाय, परन्तु यदि उसी गंगा को छोटी-छोटी नालियों में विभक्त कर दिया जाय तो एक ईंट को भी नहीं बहा सकती। इसी प्रकार मन सूक्ष्म पदार्थों को जान सकता है, परन्तु विक्षिप्त वृत्ति होने से उसकी शक्ति का तिरोभाव हो जाता है। प्र०—इन्द्रियों के प्रत्यक्ष मानने और मानसिक प्रत्यक्ष के न मानने में क्या दोष होगा ? उ०—ईश्वरासिद्धेः ॥ ६२ ॥ मानसिक प्रत्यक्ष के न मानने से ईश्वर की सिद्धि न होगी। क्योंकि रूप न होने से वह चक्षु का विषय नहीं; सुगंध न होने से वह नासिका का विषय नहीं; रस न होने से वह रसना का विषय नहीं। जब ईश्वर का प्रत्यक्ष न हुआ तो अनुमान भी न होगा, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्ष-पूर्वक होता है। जिसका तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उसमें अनुमान हो नहीं सकता और शब्द प्रमाण से भी काम न चलेगा; क्योंकि वेद के ईश्वर-वाक्य होने से वेद को प्रमाण मानते हैं। जब ईश्वर स्वयम् असिद्ध होगा तो उसका वाक्य वेद कैसे प्रमाण माना जायगा ? यहाँ अन्योन्या- श्रय दोष है, क्योंकि ईश्वर की सिद्धि बिना वेद का प्रमाण हो नहीं सकता, आर वेद के बिना ईश्वर-वाक्य सिद्ध हुये प्रमाण ही नहीं हो सकता। प्र०—अनुमान क्यों नहीं होगा। क्योंकि कार्य को देखकर कारण का अनुमान से ज्ञान हो सकता है। ऐसे ही सृष्टि को प्रत्यक्ष देखकर उसके कारण का अनुमान कर लेंगे ? उ०—अनुमान का होना व्याप्ति के अधीन है, और व्याप्ति प्रत्यक्ष के अधीन है। जब तक प्रत्यक्ष प्रमाण से नियत कारण कार्य का सम्बन्ध ज्ञान न हो जाय, तब तक व्याप्ति नहीं हो

( ४० ) सकती, और जब तक व्याप्ति न हो तब तक अनुमान नहीं हो सकता। जैसे जब बादल होता है, तभी वृष्टि होती है, बिना बादल के कभी वृष्टि होती नहीं देखी ; इसलिये जिसका तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उसका अनुमान से ज्ञान नहीं हो सकता। प्र०—हम नियम-पूर्वक कार्य को बिना चेतन कर्ता के नहीं देखते, इससे हम नियमित कार्य से चेतन का अनुमान करते हैं। यह जगत् भी परिणामी होने से कार्य, और नियम पूर्वक होने से अपने चेतन कारण के अनुमान का साधक होगा ? उ०—मुक्तबद्धयोरन्यतराभावान्न तत्सिद्धिः। ६३ अर्थ—संसार में कोई चेतन मुक्त और बद्ध से भिन्न नहीं। यदि तुम ईश्वर को बद्ध मानो तो वह सृष्टि करने की शक्ति नहीं रखता। यदि मुक्त मानो तो इच्छा के अभाव से सृष्टि उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि संसार में जितनी सृष्टि को नियमित देखते हैं, वह कर्ता की इच्छा से होती है। उभयथाप्यसत्करत्वम् ॥ ६४ ॥ इस प्रकार मुक्त, बद्ध दोनों प्रकार के चेतन से सृष्टि का होना अनुमान से सिद्ध न होगा। इसलिये मानसिक प्रत्यक्ष अवश्य मानना पड़ेगा। ईश्वर योगियों को समाधि अवस्था में प्रत्यक्ष होते हैं, क्योंकि स्थिर मन के बिना ईश्वर का बोधक कोई प्रमाण नहीं। ईश्वर को बद्ध और मुक्त दोनों प्रकार का नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों सापेक्ष हैं, अर्थात् जो पहिले बँधा हो, वह ही बंध से छूटने से मुक्त कहला सकता है। ईश्वर इन दोनों अवस्थाओं से पृथक् है। जगत् का करना उसका स्वभाव है, इसलिये इच्छा की आवश्यकता नहीं।

( ४१ ) प्र०—एक वस्तु में दो विरुद्ध स्वभाव हो नहीं सकते । यदि रचना ईश्वर का स्वभाव मानोगे तो विनाश किसका स्वभाव मानोगे ? उ०—यह शङ्का परतन्त्र और अचेतन में हो सकती है, क्योंकि कर्त्ता स्वतन्त्र होता है, और स्वतन्त्र उसे कहते हैं, जिसमें करने न करने और उलटा करने की सामर्थ्य हो । मुक्तात्मनः प्रशंसा उपासासिद्धिस्य वा ॥ ६५ ॥ उपासना के सिद्ध होने से जो मुक्तात्मा की प्रशंसा की जाती है, इससे प्रतीत होता है, कि ईश्वर है, जिसकी उपासना से अविवेक की निवृत्ति और विवेक की प्राप्ति होकर आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है । तत्सन्निधानादधिष्ठातृत्वं मणिवत् ॥ ६६ ॥ प्रकृति क्रिया रहित है। उसको क्रियाशक्ति ईश्वर की समीपता से प्राप्त होती है, जैसे—मणि को काँच की समीपता से सुरखी प्राप्त होती है, परमात्मा में इच्छा के न होने से उस अकर्त्ता कहा जाता है, और बिना उसकी समीपता के प्रकृति करने में असमर्थ है, जैसे—बिना हाथ के जीव उठा नहीं सकता, इस वास्ते कहते हैं, उठाना जीव का धर्म नहीं, परन्तु हाथ में जीव के बिना क्रियाशक्ति नहीं। इस वास्ते जीवात्मा को कर्ता माना जाता है। विशेषकार्येष्वपि जीवानाम् ॥ ६७ ॥ जो कार्य सामान्यरूप से जगत् में होते हैं, वह तो परमात्मा की सत्ता से होते हैं, और जो कार्य विशेषरूप से प्रति शरीर में भिन्न-भिन्न होतें हैं, वे जीव की सत्ता से होते हैं। संसार के आत्मा को परमात्मा और शरीर के आत्मा को जीवात्मा कहते हैं।

( ४२ ) प्र०—यदि प्रत्यक्ष प्रमाण से व और प्रमाणों से ईश्वर की सिद्धि हो गई, तो वेद का क्या प्रमाण माना जाय ? क्योंकि अभौतिक पदार्थों का तो प्रत्यक्ष से ज्ञान हो ही जायगा, और अभौतिक का योगियों के अवाह्य प्रत्यक्ष से हो जायगा। उ०—सिद्धरूपबोद्धृत्वाद्वाक्यार्थोपदेशः ॥९८॥ अर्थ—अन्य प्रमाणों से ईश्वर के होने की तो सिद्धि हो जायगी, परन्तु उसके स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं होगा, जैसे— पुत्र को देखकर उसके पिता के होने का ज्ञान तो अनुमान से हो सकता है, परन्तु उसके रूप और आयु आदि के ज्ञान के वास्ते शब्द की आवश्यकता है। इस वास्ते वेद का अवश्य प्रमाण मानना चाहिये। अन्तः करणस्य तदुज्ज्वलितत्वाल्लोहवदधि- ष्ठातृत्वम् ॥ ९९ ॥ अन्तःकरण भी चैतन्य के संयोग से उज्ज्वलित ( प्रकाशित ) है, अतएव संकल्प विकल्पादि कार्यों का अधिष्ठातृत्व अन्तःकरण को है, जैसे—अग्नि से तपाये हुए लोहे में यद्यपि दाहशक्ति अग्नि संयोग के कारण है तथापि अन्य पदार्थों के दाह करने को वह लोहशक्ति भी हेतु हो सकती है। प्रतिबन्धदृशः प्रतिबद्धज्ञानमनुमानम् ॥ १०० ॥ जो इन्द्रिय-ग्राह्य पदार्थ नहीं दीखता, उसके ज्ञान के साधन को अनुमान कहते हैं; जैसे—अग्नि प्रत्यक्ष नहीं दीखती, किन्तु धूम को देखकर उसका ज्ञान हो जाना, इसी का नाम अनुमान है। यह अनुमान व्याप्ति और साहचर्य नियम के ज्ञान बिना नहीं होता ; जैसे—जब तक कोई पुरुष पाकशाला आदि में धूम और

( ४३ ) अग्नि की व्याप्ति न समझ लेगा कि जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि अवश्य होती है, तब तक धूम को देखकर अग्नि का अनुमान कदापि नहीं कर सकता। वह अनुमान जितने प्रकार का है, इसका निर्णय आगे करेंगे। किन्तु प्रथम शब्द प्रमाण का लक्षण करते हैं। आप्तोपदेशः शब्दः ॥ १०१ ॥ यह सूत्र सब शास्त्रों में ऐसा ही है। जैसे तीनों वेदों में गायत्री मन्त्र एक सम है, इसी भाँति इस सूत्र को भी जानना चाहिये। जो पुरुष धर्मनिष्ठ वाह्य धर्म से धर्मी के ज्ञान को यथार्थ रीति पर जानते हैं, तथा शुद्ध आचरणवान् हैं, उनका नाम आप्त है। उनके उपदेश को शब्द प्रमाण कहते हैं। आप्ति का अर्थ योग्यता है, इस कारण तत्वज्ञान से युक्त अपौरुष-वाक्य वेद ही शब्द प्रमाण जानना चाहिये। अब अगले सूत्र से प्रमाण मानने की आवश्यकता को प्रकट करते हैं। उभयसिद्धिः प्रमाणात् तदुपदेशः ॥ १०२ ॥ जब तक मनुष्य को वस्तु का सामान्य ज्ञान हो, परन्तु यथार्थ ज्ञान न हो, तब तक वह संशय कहाता है। संशय की निवृत्ति बिना प्रमाण के हो नहीं सकती और संशय की निवृत्ति के बिना प्रवृत्ति नहीं हो सकती। प्रमाण से आत्म, अनात्म, सद्, असद्, दोनों प्रकार की सिद्धि होती है, इसी कारण प्रमाण का उपदेश किया है। सामान्यतोदृष्टादुभयसिद्धिः ॥ १०३ ॥ तीन प्रकार के अनुमान होते हैं—पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट। पूर्ववत् अनुमान उसे कहते हैं, जैसे धूम को देखकर अग्नि का अनुमान किया जाता है, क्योंकि पहिले पाक-

( ४४ ) शाला में धूम और अग्नि दोनों देखे थे, वैसे ही अन्यत्र होंगे, इस प्रकार का अनुमान पूर्ववत् कहाता है। जो विषय कभी प्रत्यक्ष नहीं किया उसका कारण द्वारा अनुमान करना शेषवत् अनुमान कहाता है; जैसे—स्त्री और पुरुष दोनों को नीरोग और हृष्ट-पुष्ट देखकर इनके पुत्रोत्पत्ति होगी यह अनुमान करना, वा मेघ को देखकर जल बरसेगा, यह अनुमान करना शेषवत् का उदाहरण है। जिस जातीय विषय को प्रत्यक्ष कर लिया है, उसके द्वारा समस्त जाति मात्र के कार्य्य का अनुमान करना सामान्यतो- दृष्ट कहाता है; जैसे—दो एक मनुष्य को देखकर यह बात निश्चय करली कि मनुष्य के सींग नहीं होते, तो अन्य मनुष्य मात्र के सींग न होंगे। यह सामान्यतोदृष्ट का उदाहरण है। इसी भाँति सामान्यतोदृष्ट अनुमान में यह बात भी आसकती है, कि जैसे बिना कारण के कार्य्य की अनुत्पत्ति सामान्यतोदृष्ट है। इससे यह निश्चय कर लेना चाहिये कि जहाँ-जहाँ कार्य्य होगा, वहाँ-वहाँ कारण भी अवश्य होगा। चिदवसानो भोगः ॥ १०४ ॥ चैतन्यता का जो अवसान अर्थात् अभाव है, उसे भोग कहते हैं। यहाँ पर महर्षि भोक्ता और भोग को पृथक्-पृथक् करते हैं, क्योंकि जड़ पदार्थ भोग होते और चैतन्य भोक्ता होता है, तथा भोग सदा परिणामी होता है, और भोक्ता एक रस और चैतन्य होता है। प्र०—क्या जड़, मन और इन्द्रियें भोक्ता नहीं ? उ०—नहीं, यह तो भोग के साधन हैं। प्र०—कर्म तो मन और इन्द्रियाँ करते हैं तो अकर्त्ता जीवात्मा उसका फल क्यों भोगता है ?

( ४५ ) उ०—अकर्तुरपिफलोपभोगोऽन्नाद्यवत् ॥ १०५ जिस प्रकार किसानों के उत्पन्न किये अन्नादि का भोग राजा करता है और सेना के हार जाने से राजा को दुःख होता है, इसी प्रकार इन्द्रियों के किये कर्मों का फल आत्मा भोगता है । प्र०—पहिले मान चुके हो—अन्य के कर्म से दूसरे का बंधन नहीं होता, अब कहते हो दूसरे का किया दूसरा भोगता है ? उ०—स्वतन्त्र कर्त्ता होता है । स्वतन्त्र के किये का फल स्वतंत्र को नहीं मिलता । यह इन्द्रियें और मन स्वतंत्र नहीं, किन्तु आत्मा के करने के साधन हैं, जैसे—खड्ग से काटने का कर्त्ता मनुष्य कहलाता है, ऐसे ही इन्द्रियों के कर्मों का फल जीव को होता है । प्र०—चैतन्य जीवात्मा को दुःखादि विकार कैसे होसक्ता है ? उ०—अविवेकाद्वा तत्सिद्धेः कर्तुर्फलावगमः १०६ कर्त्ता को फल अविवेक से होता है, क्योंकि जीवात्मा अल्पज्ञ है । वस्तु का यथार्थ ज्ञान विना नैमित्तिक ज्ञान के नहीं रहता, इसलिये वह अविवेक से शरीरादि के विकारों को अपने में मानता है, जिससे उसे दुःख-सुख प्रतीत होते हैं ; जैसे—संसार में लोग प्राकृत धन को अपना मानकर उसके नाश से दुःख मानते हैं, ऐसे ही अविवेक से शरीरनिष्ठ विकारों से जीव अपने को दुःखी-सुखी अनुभव करता है । नोभयं च तत्त्वाख्याने ॥ १०७ ॥ जब पुरुष प्रमाणों से यथार्थ ज्ञान को प्राप्त हो जाता है, तो सुख दुःख दोनों नहीं रहते ; क्योंकि जब हमें यह निश्चय हो जाता है, हम शरीर नहीं और न यह शरीर हमारा है, किन्तु

( ४६ ) प्रकृति का विकार है, तो इसके दुःख सुख का हमें लेश भी नहीं प्रतीत होता । प्र०-प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्राकृतिक ज्ञान नहीं होता, इसलिये प्रकृति असिद्ध है ; क्योंकि वह किसी इन्द्रिय का विषय नहीं ? उ०-विषयोऽविषयोऽप्यति दूरादेर्हानोपा- दानाभ्यामिन्द्रियस्य ॥ १०८ ॥ इन्द्रियों के विषय अति दूरादि कारणों से अविषय हो जाते हैं, इस वास्ते किसी इन्द्रिय का विषय न होने से प्रकृति की असिद्धि नहीं हो सकती है, जैसे-अभी एक मनुष्य था, परन्तु थोड़े काल में दूर चला गया, अब वह किसी इन्द्रिय का विषय नहीं रहा । प्र०-कितने कारण हैं जिनसे वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता ? उ०-अति दूर होने से, अति समीप होने से, इन्द्रिय के बिगड़ जाने से, मन के अस्थिर न होने, या मन के दूसरे काम में लगे होने से, अति सूक्ष्म होने से, बीच में परदा होने से इत्यादि, और भी कई कारणों से प्रत्यक्ष का विषय अविषय होता है, इसलिये किसी वस्तु के प्रत्यक्ष न होने से उसकी असिद्धि नहीं हो सकती । प्र०-प्रकृति का प्रत्यक्ष न होने मैं क्या कारण है ? सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिः ॥ १०६ ॥ उ०-प्रकृति और पुरुष का सूक्ष्म होने से प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता, सूक्ष्म होने से अत्यन्त अणु होना अभिप्राय नहीं ; क्योंकि प्रकृति और पुरुष सर्वत्र व्यापक हैं, इनका प्रत्यक्ष योगियों को ही होता है । प्र०-प्रकृति के प्रत्यक्ष न होने से यह क्यों माना जावे, कि अति सूक्ष्म होने से प्रकृति का प्रत्यक्ष नहीं होता, किन्तु प्रकृति का

( ४७ ) अभाव ही मानना चाहिये, नहीं शशशृङ्ग की अप्रतीति भी अति सूक्ष्म होने से माननी पड़ेगी ? कार्य्यदर्शनात्तदुपलब्धेः ॥ ११० ॥ उ०-संसार में प्रकृति के कार्यों को देखने से प्रकृति का होना सिद्ध होता है ; क्योंकि कार्य्य को देखने से कारण का अनुमान होता है, और इन कार्यों को बिगाड़कर सूक्ष्म होकर कारण में लय होने से कारण की सूक्ष्मता का अनुमान होता है । वादिविप्रतिपत्तेस्तदसिद्धिरिति चेत् ॥ १११ ॥ यदि संसार में वादी लोग प्रकृति की असिद्धि में यह हेतु दें कि कोई ब्रह्म को जगत् का कारण मानते हैं, कोई परमाणुओं को, कोई जगत् को अनुत्पन्न ही मानते हैं, तो इस जगत्-रूप कार्य्य से प्रकृति के अनुमान करने में क्या हेतु है ? प्रथम तो जगत् का कार्य होना साध्य है, दूसरे कारण ब्रह्म है, या प्रकृति यह संशयात्मक है, इसलिये प्रकृति असिद्ध है । तथाप्येकतरदृष्ट्या एकतरसिद्धेर्नोपलापः ॥११२ जब एक कार्य को देखकर कारण का अनुमान होता है और कारण को देखकर कार्य का अनुमान होता है, तो प्रकृति को कारण सिद्ध मानना अनुचित नहीं, क्योंकि सब कार्य प्रकृति में लय होते हैं । द्वितीय पुरुष जो अपरिणामी है उसको परिणामी प्रकृति के अविवेक से बन्ध और विवेक से मुक्ति होती है । त्रिविधविरोधापत्तेश्च ॥ ११३ ॥ सब कार्य तीन प्रकार के होते हैं-अतीत अर्थात गुजरा हुआ, दूसरे वर्त्तमान, तीसरे आनेवाला । यदि कार्य को सत न माने तो यह तीन प्रकार का व्यवहार-जैसे, घट टूट गया, अथवा

( ४८ ) घट वर्तमान है, अथवा घट होगा, नहीं बन सकेगा । दूसरे दुःख सुख मोहादि की उत्पति में विरोध होगा ; क्योंकि ब्रह्म तो आनन्दस्वरूप होने से दुःखादि से शून्य है, और परमाणु और प्रकृति में नाममात्र भेद है, इसलिए प्रकृति जगत् का कारण सिद्ध है, अगले सूत्र में इसे और भी पुष्ट करते हैं— नासदुत्पादो नृशृङ्गवत् ॥ ११४ ॥ असत् किसी वस्तु का कारण नहीं हो सकता, जैसे—मनुष्य के सींग नहीं, इसलिये संसार में उसका कोई कार्य भी प्रतीत नहीं होता, न उससे कोई कुछ बना सकता है । उपादाननियमात् ॥ ११५ ॥ संसार में सब बस्तुओं का उपादान नियत है, जैसे—मृत्तिका से घट तो बन सकता है परन्तु पट नहीं बन सकता, या लोहे से तलवार बन सकती है, रुई से नहीं बन सकती, जल से बर्फ बनती है, घी से नहीं बनती, इसी प्रकार सब पदार्थों के उपादान कारण नियत हैं, नियमित कार्य कारण भाव के सत् होने से कार्य को भी सत् मानना पड़ेगा । सर्वत्र सर्वदा सर्व्वासम्भवात् ॥ ११६ ॥ यह कथन सर्वथा असम्भव है, क्योंकि संसार में ऐसे वाक्यों का साधक कोई भी दृष्टांतादिक नहीं दीखता कि ( असतः सज्जायते ) अर्थात् असत् से सत् होता है । अतः मानना पड़ेगा कि ( सतः सज्जायते ) अर्थात् सत् से सत् ही उत्पन्न होता है । शक्तस्य शक्यकरणात् ॥ ११७ ॥ कार्य में कारण का शक्तिमत्व होना ही उपादान कारण होता है, क्योंकि जिस कारण द्रव्य में जो कार्यशक्ति वर्तमान ही नहीं

( ४६ ) है, उससे अभिलषित कार्य कदापि नहीं हो सकता ; जैसे कि कृष्ण रंग से श्वेत रंग कदापि नहीं हो सकता । अब इससे यथार्थ सिद्ध होगया कि जैसे कृष्ण रंग से श्वेत रंग उत्पन्न नहीं हो सकता, इसी प्रकार असत् से सत् भी उत्पन्न नहीं हो सकता । कारणभावाच्च ॥ ११८ ॥ उत्पत्ति से पहिले हो कार्य का कारण से भेद नहीं है, क्योंकि कार्य कारण के भीतर ही सदैव रहता है, जैसे कि तेल तिलों के भीतर रहता है । न भावे भावयोगश्चेत् ॥ ११९ ॥ अब इसमें प्रश्न पैदा होता है कि कार्य तो नित्य है तो भावरूप 'सत्' कार्य में भावरूप उत्पत्तियोग नहीं हो सकता, असत् से सत् की उत्पत्ति के व्यवहार होने से । अब इस विषय में सांख्य के आचार्य अपने मत को प्रकाश करते हैं। नाभिव्यक्ति निबन्धनौ व्यवहारा व्यवहारौ । १२० अब यहाँ पर सन्देह होता है कि यद्यपि उत्पत्ति से पहिले सत् कार्य की किसी प्रकार उत्पत्ति हो, परन्तु अब कार्य सत्ता अनादि है, तो उसका नाश क्यों हो सके । इसका उत्तर यह है, कि कार्य की उत्पत्ति का व्यवहार और अव्यवहार अभिव्यक्ति निमित्तक है, अर्थात् अभिव्यक्ति के भाव से कार्य की उत्पत्ति होती है । अभिव्यक्ति के अभाव से उत्पत्ति का अभाव है। जो पूर्व यह शंका की थी, कि यदि कारण में कार्य रहता है, तो अमुक कार्य उत्पन्न हुआ, ऐसा कहना भी नहीं हो सकता । उसके ही उत्तर में यह सूत्र है, कि अभिव्यङ्ग्यमान कार्य की उत्पत्ति का व्यवहार अभिव्यक्ति निमित्तक है । पूर्व जो कार्य असत् नहीं था उसकी अब उत्पत्ति हुई यह कथन ठीक नहीं है ।

( ५० ) नाशः कारण लयः ॥ १२१ ॥ "लीङ्" श्लेषणे धातु से लय शब्द बनता है। अति सूक्ष्मता के साथ कार्य्य का कारण में मिल जाना, इसी का नाम नाश है। कार्य्य की व्यतीत अवस्था अर्थात् जो अवस्था कार्य्य की उत्पत्ति से पूर्व थी, उसी को धारण कर लेना और जो नाश भविष्यत् में होनेवाला है, उसी का नाम प्रागभाव नामक नाश है। कोई कोई यह कहते हैं कि जो वस्तु नाश हो जाती है उसकी पुनरुत्पत्ति नहीं होती, परन्तु यह कहना सर्वथा अयोग्य है, क्योंकि इस कथन से प्रत्यभिज्ञा में दोष होगा, अर्थात् जिस पदार्थ को दो वर्ष पहले देखा था, उसको ही इस समय देखने से यह ज्ञान होता है कि जो पदार्थ पहिले देखा था उसीको इस समय देखता हूँ। इस ज्ञान में यह दोष होगा कि जो ज्ञान पूर्व हुआ था वह इतने दिन तक नष्ट रहा और फिर भी समयानुसार उत्पन्न होगया। यदि नष्ट हुये कार्य्य की दूसरी बार अनुत्पत्ति ही ठीक होती तो इसमें अनुत्पत्ति का लक्षण पाया भी जाता। अतएव यही कहना ठीक है कि नाश को प्राप्त कार्य्य फिर भी उत्पन्न हो सकता है। अब यह सन्देह होता है कि यदि पहिले कहा हुआ ही पक्ष ठीक है, तो अपने कारण में कार्य्य का नाश होता क्यों नहीं दीखता, जैसे—तन्तु कपास से पैदा होते हैं, परन्तु नाश के समय वह मिट्टी में मिल जाते हैं। इसका उत्तर यह है कि कार्य्य का कारण में लय होजाना विवेकी पुरुषों को दीखता है और अविवेकियों को नहीं दीखता, जैसे—तन्तु मिट्टी के रूप होजाते हैं और मिट्टी कपास के वृक्षरूप होजाती है और वह वृक्ष फूल, फल, कपास आदि रूप से परिणाम को प्राप्त होता है और जब कार्य्य का नाम और उसीके समान कुछ बदला हुआ रूप संसार में मौजूद है, तब नाश, ऐसा कहना भी योग्य नहीं। यही

( ५१ ) सिद्धान्त महाभाष्यकार महर्षि पतञ्जलिजी का भी है, कि आकृति नित्य है। अब यहाँ यह सन्देह होता है कि अभिव्यक्ति कार्य की उत्पत्ति के पूर्व भी थी या नहीं थी ? यदि थी तो कारण के यत्न से पूर्व अभिव्यक्ति को स्वकार्य-जनकता दोष होगा और उत्पत्ति के लिए जो कारण द्वारा यत्न किया जाता है वह व्यर्थ होगा। यदि कार्य की उत्पत्ति से पहिले अभिव्यक्ति नहीं थी तो सत्कार्य पक्ष में हानि होगी ; क्योंकि जब यह कह चुके हैं कि जो कार्य पूर्व था, उसी की इस समय उत्पत्ति होती है, किन्तु असत् की उत्पत्ति नहीं होती, तो अभिव्यक्ति का पूर्व में अभाव कहने में दोष होगा। यदि यह कहा जाय कि अभिव्यक्ति तो पूर्व भी थी लेकिन एक अभिव्यक्ति से दूसरी अभिव्यक्ति कारण द्वारा होती जाती है, इसीलिये कारण व्यापार है, ऐसा कहने पर अनवस्था दोष होगा ; क्योंकि एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी, इसी तरह कहते जाओ, लेकिन कहीं भी विश्राम नहीं हो सकता, इस कारण यह अनवस्था दोष हो गया। इन पूर्व कहे दोषों के उत्तर यह हैं—प्रथम तो कारण व्यापार से सब कार्यों की उत्पत्ति होती है, इस प्रकार पूर्वोक्त शंका ही नहीं हो सकती। दूसरे यदि यह भी मान लिया जाय कि अभिव्यक्ति पहिले नहीं थी, तो भी कारण व्यापार द्वारा उसकी सत्ता प्रकाश करने के वास्ते सदैव आवश्यक है, तब कोई दोष नहीं हो सकता। तीसरे यह भी है कि जब कार्य्य की अनागत अवस्था में ( जबतक कार्य उत्पन्न नहीं हुआ ) सत् कार्य्यवाद की कोई हानि नहीं हो सकती, तब दोष भी नहीं हो सकता ; क्योंकि जबतक घट पैदा ही नहीं हुआ, उससे पहिले भी सत् कार्य्यवादी मिट्टी में घट को मानते हैं, इसी प्रकार अभिव्यक्ति को भी समझना चाहिये। यदि कोई ऐसा सन्देह करे कि कार्य का प्रागभाव “पहिले न होना” ही नहीं मानते तो घट पहिले नहीं था, किन्तु अब पैदा हुआ है, ऐसा कहना भी नहीं

( ५२ ) बन सकता। इसका उत्तर यह है, कि कार्य की अवस्थाओं का ही भाव अभाव कहते हैं न कि कार्य का और जो अनवस्था दोष दिया उसका उत्तर यह है:— पारम्पर्यतोऽन्वेषणा बीजांकुरवत् ॥ १२२ ॥ बीज और अंकुर के समान अर्थात् जब विचार किया जाता है कि पहिले बीज था या वृक्ष, इस विषय में परम्परा मानी गई है। इसी तरह अभिव्यक्ति मानो गई है, सिर्फ भेद इतना ही है, कि उसमें क्रमिक परम्परा दोष उत्पन्न होता है, अर्थात् पहिले कौन था, और इसमें एक-कालिक एक ही समय में एक का दूसरे से उत्पन्न होना यह दोष होगा, लेकिन यह दोष इस कारण माना जाता है, कि पातञ्जलभाष्य में भी व्यासजी ने कार्यों को स्वरूप में नित्य और अवस्थाओं से विनाशी माना है, वहां अनवस्था दोष को प्रामाणिक माना है। यह बीजाङ्कुर का दृष्टान्त केवल लौकिक है, वास्तव में यहाँ जन्म और कर्म का दृष्टान्त दिया जाता तो श्रेष्ठ था ; जैसे—जन्म से कर्म होता है या कर्म से जन्म, क्योंकि बीजाङ्कुर के झगड़े में कोई-कोई आदि सर्ग में वृक्ष के बिना ही बीज की उत्पत्ति मानते हैं, वास्तव में अवस्था कोई वस्तु नहीं है, इसको कहते हैं:— उत्पत्तिवद्वादोषः ॥ १२३ ॥ जैसेकि घट की उत्पत्ति के स्वरूप को ही वैशेषिकादि असत् कार्यवादी कमी के सबब मानते हैं, अर्थात् यह उत्पत्ति किस से उत्पन्न हुई, ऐसा सन्देह नहीं करते, केवल एक ही उत्पत्ति को मानते हैं। इसी तरह अभिव्यक्ति की उत्पत्ति किस से हुई, यह विवाद नहीं करना चाहिये। केवल अभिव्यक्ति को ही मानना चाहिये। सत्कार्यवादी और असत् कार्यवादी इन दोनों में केवल इतना ही भेद है, कि असत् कार्यवादी कार्य

( ५३ ) उत्पत्ति की पूर्व दशा को प्रागभाव और कार्य के कारण में लय होजाने को ध्वंस कहते हैं, और इन दोनों अवस्थाओं में कार्य का अभाव मानते हैं, और इसी प्रकार सत्कार्यवादी कही हुई दोनों अवस्थाओं को अनागत और अतीत कहते हैं, तथा उन अवस्थाओं में कार्य का भाव मानते हैं, कार्य से कारण का अनुमान कर लेना चाहिए । प्र०-किस-किस को कार्य कहते हैं ? उ०-हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रित लिङ्गम् ॥ १२४ ॥ हेतुमान् अर्थात् कारणवाला, अनित्य अर्थात् हमेशा एकसा जो न रहे, अव्यापि अर्थात् एक देश में रहनेवाला, सक्रिय क्रिया की अपेक्षावाला, अनेक जिसके अलग-अलग भेद मालूम होवें, आश्रित कारण के अधीन इसको लिङ्ग अर्थात् कार्य के पहिचानने का चिह कहते हैं । प्र०-जिसमें हेतुमत्वादिक होते हैं वही प्रधान के लिङ्ग कहे जाते हैं ? उ०-तुम्हारा यह कहना सर्वथा असंगत है ; क्योंकि प्रथम तो इस सूत्र में वा पूर्व सूत्र में प्रधान का नाम ही नहीं है, दूसरे सांख्यकार ने प्रधान शब्द को रूढ़ि नहीं माना, इसी कारण इसको पुरुषवाचक भी कह सकते हैं; किन्तु प्रकृतिवाचक है । तीसरे यदि उनके तात्पर्यानुसार ( मतलब के माफ़िक़ ) यह लिङ्ग पुरुष के ही मान लिये जावें तो भी ठीक नहीं, क्योंकि सांख्यकार के मत में कार्यमात्र की उत्पत्ति प्रकृति से है, एवं प्रकृति और पुरुष का भेद भी माना है, एवं परस्परानपेक्षा भी कपिलाचार्य का सिद्धांत है, तो प्रकृति से पुरुष का अनुमान नहीं हो सकता।

( ५४ ) हेतुमत्वादि विशेषण देने से कार्य कारण में भेद मालूम होता है, इसी कारण उस भेद की प्रतीति में प्रमाण देते हैं— आञ्जस्याद् भेदतो वा गुण सामान्यादेस्तत्सिद्धिः प्रधानव्यपदेशाद्वा ॥ १२५ ॥ अर्थ—आञ्जस्य ( प्रत्यक्ष ) से, वा कारण के सामान्य गुण कार्य में पाये जाते हैं। विशेष गुणों में भेद रहता है, इससे प्रधान व्यपदेश से अर्थात् यह कारण है, यह कार्य है। इस लौकिक व्यवहार से कार्य कारण के भेद की सिद्धि होती है। त्रिगुणचेतनत्वादि द्वयोः ॥ १२६ ॥ अब कार्य कारण का भेद कहकर कार्य कारण का साधर्म्य, अर्थात् बराबरीपन कहते हैं—कि सत्, रज, तम यह तीनों गुण अचेतनत्वादि धर्म दोनों के समान ही हैं, आदि शब्द से परिणामित्वादि का ग्रहण होता है। प्रीत्य प्रीति विषादाद्यैर्गुणा नामन्योन्य वैधर्म्यम् ॥ १२७ ॥ अर्थ—अब कार्य कारण का परस्पर ( आपस में ) वैधर्म्य कहते हैं—सत्व, रज, तम, इन गुणों का सुख दुःख मोह इनमें अन्योऽन्य वैधर्म्य ( एक ही कारण से अनेक-अनेक प्रकार के कार्य की उत्पत्ति होना ) दिखाई पड़ता है। इस सूत्र में आदि शब्द से जिनका ग्रहण होता है, उनका वर्णन पञ्चशिखाचार्य ने इस प्रकार किया है कि सत्वगुण से प्रीति, तितिक्षा, सन्तोष आदि सुखात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं। इस ही रीति से रजोगुण से अप्रीति शोक आदि दुःखात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं, एवं तम से विषाद, निद्रा ( नींद ) आदि मोहात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य