सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४१ ) प्र०—एक वस्तु में दो विरुद्ध स्वभाव हो नहीं सकते । यदि रचना ईश्वर का स्वभाव मानोगे तो विनाश किसका स्वभाव मानोगे ? उ०—यह शङ्का परतन्त्र और अचेतन में हो सकती है, क्योंकि कर्त्ता स्वतन्त्र होता है, और स्वतन्त्र उसे कहते हैं, जिसमें करने न करने और उलटा करने की सामर्थ्य हो । मुक्तात्मनः प्रशंसा उपासासिद्धिस्य वा ॥ ६५ ॥ उपासना के सिद्ध होने से जो मुक्तात्मा की प्रशंसा की जाती है, इससे प्रतीत होता है, कि ईश्वर है, जिसकी उपासना से अविवेक की निवृत्ति और विवेक की प्राप्ति होकर आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है । तत्सन्निधानादधिष्ठातृत्वं मणिवत् ॥ ६६ ॥ प्रकृति क्रिया रहित है। उसको क्रियाशक्ति ईश्वर की समीपता से प्राप्त होती है, जैसे—मणि को काँच की समीपता से सुरखी प्राप्त होती है, परमात्मा में इच्छा के न होने से उस अकर्त्ता कहा जाता है, और बिना उसकी समीपता के प्रकृति करने में असमर्थ है, जैसे—बिना हाथ के जीव उठा नहीं सकता, इस वास्ते कहते हैं, उठाना जीव का धर्म नहीं, परन्तु हाथ में जीव के बिना क्रियाशक्ति नहीं। इस वास्ते जीवात्मा को कर्ता माना जाता है। विशेषकार्येष्वपि जीवानाम् ॥ ६७ ॥ जो कार्य सामान्यरूप से जगत् में होते हैं, वह तो परमात्मा की सत्ता से होते हैं, और जो कार्य विशेषरूप से प्रति शरीर में भिन्न-भिन्न होतें हैं, वे जीव की सत्ता से होते हैं। संसार के आत्मा को परमात्मा और शरीर के आत्मा को जीवात्मा कहते हैं।