भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ४२ ) प्र०—यदि प्रत्यक्ष प्रमाण से व और प्रमाणों से ईश्वर की सिद्धि हो गई, तो वेद का क्या प्रमाण माना जाय ? क्योंकि अभौतिक पदार्थों का तो प्रत्यक्ष से ज्ञान हो ही जायगा, और अभौतिक का योगियों के अवाह्य प्रत्यक्ष से हो जायगा। उ०—सिद्धरूपबोद्धृत्वाद्वाक्यार्थोपदेशः ॥९८॥ अर्थ—अन्य प्रमाणों से ईश्वर के होने की तो सिद्धि हो जायगी, परन्तु उसके स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं होगा, जैसे— पुत्र को देखकर उसके पिता के होने का ज्ञान तो अनुमान से हो सकता है, परन्तु उसके रूप और आयु आदि के ज्ञान के वास्ते शब्द की आवश्यकता है। इस वास्ते वेद का अवश्य प्रमाण मानना चाहिये। अन्तः करणस्य तदुज्ज्वलितत्वाल्लोहवदधि- ष्ठातृत्वम् ॥ ९९ ॥ अन्तःकरण भी चैतन्य के संयोग से उज्ज्वलित ( प्रकाशित ) है, अतएव संकल्प विकल्पादि कार्यों का अधिष्ठातृत्व अन्तःकरण को है, जैसे—अग्नि से तपाये हुए लोहे में यद्यपि दाहशक्ति अग्नि संयोग के कारण है तथापि अन्य पदार्थों के दाह करने को वह लोहशक्ति भी हेतु हो सकती है। प्रतिबन्धदृशः प्रतिबद्धज्ञानमनुमानम् ॥ १०० ॥ जो इन्द्रिय-ग्राह्य पदार्थ नहीं दीखता, उसके ज्ञान के साधन को अनुमान कहते हैं; जैसे—अग्नि प्रत्यक्ष नहीं दीखती, किन्तु धूम को देखकर उसका ज्ञान हो जाना, इसी का नाम अनुमान है। यह अनुमान व्याप्ति और साहचर्य नियम के ज्ञान बिना नहीं होता ; जैसे—जब तक कोई पुरुष पाकशाला आदि में धूम और