भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 44

( ४३ ) अग्नि की व्याप्ति न समझ लेगा कि जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि अवश्य होती है, तब तक धूम को देखकर अग्नि का अनुमान कदापि नहीं कर सकता। वह अनुमान जितने प्रकार का है, इसका निर्णय आगे करेंगे। किन्तु प्रथम शब्द प्रमाण का लक्षण करते हैं। आप्तोपदेशः शब्दः ॥ १०१ ॥ यह सूत्र सब शास्त्रों में ऐसा ही है। जैसे तीनों वेदों में गायत्री मन्त्र एक सम है, इसी भाँति इस सूत्र को भी जानना चाहिये। जो पुरुष धर्मनिष्ठ वाह्य धर्म से धर्मी के ज्ञान को यथार्थ रीति पर जानते हैं, तथा शुद्ध आचरणवान् हैं, उनका नाम आप्त है। उनके उपदेश को शब्द प्रमाण कहते हैं। आप्ति का अर्थ योग्यता है, इस कारण तत्वज्ञान से युक्त अपौरुष-वाक्य वेद ही शब्द प्रमाण जानना चाहिये। अब अगले सूत्र से प्रमाण मानने की आवश्यकता को प्रकट करते हैं। उभयसिद्धिः प्रमाणात् तदुपदेशः ॥ १०२ ॥ जब तक मनुष्य को वस्तु का सामान्य ज्ञान हो, परन्तु यथार्थ ज्ञान न हो, तब तक वह संशय कहाता है। संशय की निवृत्ति बिना प्रमाण के हो नहीं सकती और संशय की निवृत्ति के बिना प्रवृत्ति नहीं हो सकती। प्रमाण से आत्म, अनात्म, सद्, असद्, दोनों प्रकार की सिद्धि होती है, इसी कारण प्रमाण का उपदेश किया है। सामान्यतोदृष्टादुभयसिद्धिः ॥ १०३ ॥ तीन प्रकार के अनुमान होते हैं—पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट। पूर्ववत् अनुमान उसे कहते हैं, जैसे धूम को देखकर अग्नि का अनुमान किया जाता है, क्योंकि पहिले पाक-