भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ४४ ) शाला में धूम और अग्नि दोनों देखे थे, वैसे ही अन्यत्र होंगे, इस प्रकार का अनुमान पूर्ववत् कहाता है। जो विषय कभी प्रत्यक्ष नहीं किया उसका कारण द्वारा अनुमान करना शेषवत् अनुमान कहाता है; जैसे—स्त्री और पुरुष दोनों को नीरोग और हृष्ट-पुष्ट देखकर इनके पुत्रोत्पत्ति होगी यह अनुमान करना, वा मेघ को देखकर जल बरसेगा, यह अनुमान करना शेषवत् का उदाहरण है। जिस जातीय विषय को प्रत्यक्ष कर लिया है, उसके द्वारा समस्त जाति मात्र के कार्य्य का अनुमान करना सामान्यतो- दृष्ट कहाता है; जैसे—दो एक मनुष्य को देखकर यह बात निश्चय करली कि मनुष्य के सींग नहीं होते, तो अन्य मनुष्य मात्र के सींग न होंगे। यह सामान्यतोदृष्ट का उदाहरण है। इसी भाँति सामान्यतोदृष्ट अनुमान में यह बात भी आसकती है, कि जैसे बिना कारण के कार्य्य की अनुत्पत्ति सामान्यतोदृष्ट है। इससे यह निश्चय कर लेना चाहिये कि जहाँ-जहाँ कार्य्य होगा, वहाँ-वहाँ कारण भी अवश्य होगा। चिदवसानो भोगः ॥ १०४ ॥ चैतन्यता का जो अवसान अर्थात् अभाव है, उसे भोग कहते हैं। यहाँ पर महर्षि भोक्ता और भोग को पृथक्-पृथक् करते हैं, क्योंकि जड़ पदार्थ भोग होते और चैतन्य भोक्ता होता है, तथा भोग सदा परिणामी होता है, और भोक्ता एक रस और चैतन्य होता है। प्र०—क्या जड़, मन और इन्द्रियें भोक्ता नहीं ? उ०—नहीं, यह तो भोग के साधन हैं। प्र०—कर्म तो मन और इन्द्रियाँ करते हैं तो अकर्त्ता जीवात्मा उसका फल क्यों भोगता है ?