भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ४५ ) उ०—अकर्तुरपिफलोपभोगोऽन्नाद्यवत् ॥ १०५ जिस प्रकार किसानों के उत्पन्न किये अन्नादि का भोग राजा करता है और सेना के हार जाने से राजा को दुःख होता है, इसी प्रकार इन्द्रियों के किये कर्मों का फल आत्मा भोगता है । प्र०—पहिले मान चुके हो—अन्य के कर्म से दूसरे का बंधन नहीं होता, अब कहते हो दूसरे का किया दूसरा भोगता है ? उ०—स्वतन्त्र कर्त्ता होता है । स्वतन्त्र के किये का फल स्वतंत्र को नहीं मिलता । यह इन्द्रियें और मन स्वतंत्र नहीं, किन्तु आत्मा के करने के साधन हैं, जैसे—खड्ग से काटने का कर्त्ता मनुष्य कहलाता है, ऐसे ही इन्द्रियों के कर्मों का फल जीव को होता है । प्र०—चैतन्य जीवात्मा को दुःखादि विकार कैसे होसक्ता है ? उ०—अविवेकाद्वा तत्सिद्धेः कर्तुर्फलावगमः १०६ कर्त्ता को फल अविवेक से होता है, क्योंकि जीवात्मा अल्पज्ञ है । वस्तु का यथार्थ ज्ञान विना नैमित्तिक ज्ञान के नहीं रहता, इसलिये वह अविवेक से शरीरादि के विकारों को अपने में मानता है, जिससे उसे दुःख-सुख प्रतीत होते हैं ; जैसे—संसार में लोग प्राकृत धन को अपना मानकर उसके नाश से दुःख मानते हैं, ऐसे ही अविवेक से शरीरनिष्ठ विकारों से जीव अपने को दुःखी-सुखी अनुभव करता है । नोभयं च तत्त्वाख्याने ॥ १०७ ॥ जब पुरुष प्रमाणों से यथार्थ ज्ञान को प्राप्त हो जाता है, तो सुख दुःख दोनों नहीं रहते ; क्योंकि जब हमें यह निश्चय हो जाता है, हम शरीर नहीं और न यह शरीर हमारा है, किन्तु