भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ४० ) सकती, और जब तक व्याप्ति न हो तब तक अनुमान नहीं हो सकता। जैसे जब बादल होता है, तभी वृष्टि होती है, बिना बादल के कभी वृष्टि होती नहीं देखी ; इसलिये जिसका तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उसका अनुमान से ज्ञान नहीं हो सकता। प्र०—हम नियम-पूर्वक कार्य को बिना चेतन कर्ता के नहीं देखते, इससे हम नियमित कार्य से चेतन का अनुमान करते हैं। यह जगत् भी परिणामी होने से कार्य, और नियम पूर्वक होने से अपने चेतन कारण के अनुमान का साधक होगा ? उ०—मुक्तबद्धयोरन्यतराभावान्न तत्सिद्धिः। ६३ अर्थ—संसार में कोई चेतन मुक्त और बद्ध से भिन्न नहीं। यदि तुम ईश्वर को बद्ध मानो तो वह सृष्टि करने की शक्ति नहीं रखता। यदि मुक्त मानो तो इच्छा के अभाव से सृष्टि उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि संसार में जितनी सृष्टि को नियमित देखते हैं, वह कर्ता की इच्छा से होती है। उभयथाप्यसत्करत्वम् ॥ ६४ ॥ इस प्रकार मुक्त, बद्ध दोनों प्रकार के चेतन से सृष्टि का होना अनुमान से सिद्ध न होगा। इसलिये मानसिक प्रत्यक्ष अवश्य मानना पड़ेगा। ईश्वर योगियों को समाधि अवस्था में प्रत्यक्ष होते हैं, क्योंकि स्थिर मन के बिना ईश्वर का बोधक कोई प्रमाण नहीं। ईश्वर को बद्ध और मुक्त दोनों प्रकार का नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों सापेक्ष हैं, अर्थात् जो पहिले बँधा हो, वह ही बंध से छूटने से मुक्त कहला सकता है। ईश्वर इन दोनों अवस्थाओं से पृथक् है। जगत् का करना उसका स्वभाव है, इसलिये इच्छा की आवश्यकता नहीं।