सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४६ ) है, उससे अभिलषित कार्य कदापि नहीं हो सकता ; जैसे कि कृष्ण रंग से श्वेत रंग कदापि नहीं हो सकता । अब इससे यथार्थ सिद्ध होगया कि जैसे कृष्ण रंग से श्वेत रंग उत्पन्न नहीं हो सकता, इसी प्रकार असत् से सत् भी उत्पन्न नहीं हो सकता । कारणभावाच्च ॥ ११८ ॥ उत्पत्ति से पहिले हो कार्य का कारण से भेद नहीं है, क्योंकि कार्य कारण के भीतर ही सदैव रहता है, जैसे कि तेल तिलों के भीतर रहता है । न भावे भावयोगश्चेत् ॥ ११९ ॥ अब इसमें प्रश्न पैदा होता है कि कार्य तो नित्य है तो भावरूप 'सत्' कार्य में भावरूप उत्पत्तियोग नहीं हो सकता, असत् से सत् की उत्पत्ति के व्यवहार होने से । अब इस विषय में सांख्य के आचार्य अपने मत को प्रकाश करते हैं। नाभिव्यक्ति निबन्धनौ व्यवहारा व्यवहारौ । १२० अब यहाँ पर सन्देह होता है कि यद्यपि उत्पत्ति से पहिले सत् कार्य की किसी प्रकार उत्पत्ति हो, परन्तु अब कार्य सत्ता अनादि है, तो उसका नाश क्यों हो सके । इसका उत्तर यह है, कि कार्य की उत्पत्ति का व्यवहार और अव्यवहार अभिव्यक्ति निमित्तक है, अर्थात् अभिव्यक्ति के भाव से कार्य की उत्पत्ति होती है । अभिव्यक्ति के अभाव से उत्पत्ति का अभाव है। जो पूर्व यह शंका की थी, कि यदि कारण में कार्य रहता है, तो अमुक कार्य उत्पन्न हुआ, ऐसा कहना भी नहीं हो सकता । उसके ही उत्तर में यह सूत्र है, कि अभिव्यङ्ग्यमान कार्य की उत्पत्ति का व्यवहार अभिव्यक्ति निमित्तक है । पूर्व जो कार्य असत् नहीं था उसकी अब उत्पत्ति हुई यह कथन ठीक नहीं है ।