सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४८ ) घट वर्तमान है, अथवा घट होगा, नहीं बन सकेगा । दूसरे दुःख सुख मोहादि की उत्पति में विरोध होगा ; क्योंकि ब्रह्म तो आनन्दस्वरूप होने से दुःखादि से शून्य है, और परमाणु और प्रकृति में नाममात्र भेद है, इसलिए प्रकृति जगत् का कारण सिद्ध है, अगले सूत्र में इसे और भी पुष्ट करते हैं— नासदुत्पादो नृशृङ्गवत् ॥ ११४ ॥ असत् किसी वस्तु का कारण नहीं हो सकता, जैसे—मनुष्य के सींग नहीं, इसलिये संसार में उसका कोई कार्य भी प्रतीत नहीं होता, न उससे कोई कुछ बना सकता है । उपादाननियमात् ॥ ११५ ॥ संसार में सब बस्तुओं का उपादान नियत है, जैसे—मृत्तिका से घट तो बन सकता है परन्तु पट नहीं बन सकता, या लोहे से तलवार बन सकती है, रुई से नहीं बन सकती, जल से बर्फ बनती है, घी से नहीं बनती, इसी प्रकार सब पदार्थों के उपादान कारण नियत हैं, नियमित कार्य कारण भाव के सत् होने से कार्य को भी सत् मानना पड़ेगा । सर्वत्र सर्वदा सर्व्वासम्भवात् ॥ ११६ ॥ यह कथन सर्वथा असम्भव है, क्योंकि संसार में ऐसे वाक्यों का साधक कोई भी दृष्टांतादिक नहीं दीखता कि ( असतः सज्जायते ) अर्थात् असत् से सत् होता है । अतः मानना पड़ेगा कि ( सतः सज्जायते ) अर्थात् सत् से सत् ही उत्पन्न होता है । शक्तस्य शक्यकरणात् ॥ ११७ ॥ कार्य में कारण का शक्तिमत्व होना ही उपादान कारण होता है, क्योंकि जिस कारण द्रव्य में जो कार्यशक्ति वर्तमान ही नहीं