भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ५३ ) उत्पत्ति की पूर्व दशा को प्रागभाव और कार्य के कारण में लय होजाने को ध्वंस कहते हैं, और इन दोनों अवस्थाओं में कार्य का अभाव मानते हैं, और इसी प्रकार सत्कार्यवादी कही हुई दोनों अवस्थाओं को अनागत और अतीत कहते हैं, तथा उन अवस्थाओं में कार्य का भाव मानते हैं, कार्य से कारण का अनुमान कर लेना चाहिए । प्र०-किस-किस को कार्य कहते हैं ? उ०-हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रित लिङ्गम् ॥ १२४ ॥ हेतुमान् अर्थात् कारणवाला, अनित्य अर्थात् हमेशा एकसा जो न रहे, अव्यापि अर्थात् एक देश में रहनेवाला, सक्रिय क्रिया की अपेक्षावाला, अनेक जिसके अलग-अलग भेद मालूम होवें, आश्रित कारण के अधीन इसको लिङ्ग अर्थात् कार्य के पहिचानने का चिह कहते हैं । प्र०-जिसमें हेतुमत्वादिक होते हैं वही प्रधान के लिङ्ग कहे जाते हैं ? उ०-तुम्हारा यह कहना सर्वथा असंगत है ; क्योंकि प्रथम तो इस सूत्र में वा पूर्व सूत्र में प्रधान का नाम ही नहीं है, दूसरे सांख्यकार ने प्रधान शब्द को रूढ़ि नहीं माना, इसी कारण इसको पुरुषवाचक भी कह सकते हैं; किन्तु प्रकृतिवाचक है । तीसरे यदि उनके तात्पर्यानुसार ( मतलब के माफ़िक़ ) यह लिङ्ग पुरुष के ही मान लिये जावें तो भी ठीक नहीं, क्योंकि सांख्यकार के मत में कार्यमात्र की उत्पत्ति प्रकृति से है, एवं प्रकृति और पुरुष का भेद भी माना है, एवं परस्परानपेक्षा भी कपिलाचार्य का सिद्धांत है, तो प्रकृति से पुरुष का अनुमान नहीं हो सकता।