भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ५४ ) हेतुमत्वादि विशेषण देने से कार्य कारण में भेद मालूम होता है, इसी कारण उस भेद की प्रतीति में प्रमाण देते हैं— आञ्जस्याद् भेदतो वा गुण सामान्यादेस्तत्सिद्धिः प्रधानव्यपदेशाद्वा ॥ १२५ ॥ अर्थ—आञ्जस्य ( प्रत्यक्ष ) से, वा कारण के सामान्य गुण कार्य में पाये जाते हैं। विशेष गुणों में भेद रहता है, इससे प्रधान व्यपदेश से अर्थात् यह कारण है, यह कार्य है। इस लौकिक व्यवहार से कार्य कारण के भेद की सिद्धि होती है। त्रिगुणचेतनत्वादि द्वयोः ॥ १२६ ॥ अब कार्य कारण का भेद कहकर कार्य कारण का साधर्म्य, अर्थात् बराबरीपन कहते हैं—कि सत्, रज, तम यह तीनों गुण अचेतनत्वादि धर्म दोनों के समान ही हैं, आदि शब्द से परिणामित्वादि का ग्रहण होता है। प्रीत्य प्रीति विषादाद्यैर्गुणा नामन्योन्य वैधर्म्यम् ॥ १२७ ॥ अर्थ—अब कार्य कारण का परस्पर ( आपस में ) वैधर्म्य कहते हैं—सत्व, रज, तम, इन गुणों का सुख दुःख मोह इनमें अन्योऽन्य वैधर्म्य ( एक ही कारण से अनेक-अनेक प्रकार के कार्य की उत्पत्ति होना ) दिखाई पड़ता है। इस सूत्र में आदि शब्द से जिनका ग्रहण होता है, उनका वर्णन पञ्चशिखाचार्य ने इस प्रकार किया है कि सत्वगुण से प्रीति, तितिक्षा, सन्तोष आदि सुखात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं। इस ही रीति से रजोगुण से अप्रीति शोक आदि दुःखात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं, एवं तम से विषाद, निद्रा ( नींद ) आदि मोहात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य

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