सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५५ ) पैदा होते हैं। घटरूप कार्य में केवल मिट्टी से रूपमात्र का ही वैधर्म्य है। लघ्वादिधर्मैः साधर्म्यं वैधर्म्यञ्चगुणानाम् ॥१२८॥ अर्थ—लघुत्वादि धर्मों से सत्त्वादि गुणों का साधर्म्य और वैधर्म्य है; जैसे लघुत्व के साथ सर्व सत्वव्यक्तियों का ( सतोगुण के पदार्थों का साधर्म्य है, रज और तम का वैधर्म्य है, एवं चंचलत्वादि के साथ रजो व्यक्तियों का ( रजोगुण के पदार्थों का ) साधर्म्य है, और सत्व तम का वैधर्म्य है, इस ही प्रकार गुरुत्व आदि के साथ तमोव्यक्तियों का ( तमोगुण के पदार्थों का ) साधर्म्य है, और सत्व, रज से वैधर्म्य है। प्र०—यद्यपि महदादि स्वरूप से सिद्ध हैं तो भी प्रत्यक्ष से उनकी उत्पत्ति नहीं दीखती, इसी कारण महदादिकों के कार्य होने में कोई भी प्रमाण नहीं ? उ०—उभयान्यत्वात् कार्यत्वं महदादेर्घटा- दिवत् ॥ १२९ ॥ प्रकृति और पुरुष इन दोनों से महदादिक और ही हैं, इस सबब उन्हें कार्य मानना चाहिये, जैसे—घट मट्टी से अलग है इसी सबब कार्य है, क्योंकि मट्टी कहने से न तो घट का बोध होता है, और न घट कहने से मिट्टी का ही ज्ञान होता है। इसी प्रकार प्रकृति और पुरुष कहने से महदादिकों का भी ज्ञान नहीं होता। इस कारण महदादिकों को प्रकृति और पुरुष से भिन्न कार्य मानना चाहिये; क्योंकि प्रकृति और पुरुष कारण हैं, किन्तु कार्य नहीं हैं। परिणामात् ॥ १३० ॥ अर्थ—प्रकृति और पुरुष परिमित भाव से रहते हैं, कभी घटते बढ़ते नहीं। इसी सबब उनको कार्य नहीं कह सकते; क्योंकि—