सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५६ ) समन्वयात् ॥ १३१ ॥ अर्थ—मन को आदि लेके जोकि महदादिकों का अवान्तर भेद हैं, सो अन्नादिकों के मिलने से बढ़ते रहते हैं, और भूखे रहने से क्षीण होते हैं । इस पूर्वोक्त समन्वय से भी महदादिकों को कार्यत्व मालूम होता है ; क्योंकि जो नित्य पदार्थ होता है वह अवयव ( टुकड़ा ) रहित होता है, अतः उसका घटना-बढ़ना नहीं हो सकता । इसका अर्थ यह हुआ कि घटना-बढ़ना आदि कार्य में हो सकता है, कारण में नहीं हो सकता । मन आदि अन्न के मिलने से बढ़ते हैं, और न मिलने से घटते हैं। इसी से महदादिकों का कार्यत्व सिद्ध होता है । शक्तितश्चेति ॥ १३२ ॥ अर्थ—महदादिक पुरुष के कारण हैं, इसी में महदादिकों को कार्यत्व है, क्योंकि इनके बिना पुरुष कुछ नहीं कर सकता, जैसेकि नेत्रों के बिना कुछ नहीं कर सकता, अर्थात् देख नहीं सकता, और पुरुष के बिना नेत्र में देखने की शक्ति नहीं हो सकती ; क्योंकि नेत्र तो जड़ हैं, इस कारण मनुष्य दर्शन रूप क्रिया को नेत्ररूपी कारण के बिना नहीं कर सकता, इस ही सबब से नेत्रादिकों को कार्यत्व माना है । इस सूत्र में इति शब्द से यह जानना चाहिये कि प्रत्येक कार्य की सिद्धि में इतने ही प्रमाण होते हैं । तद्धाने प्रकृतिः पुरुषो वा ॥ १३३ ॥ अर्थ—महदादिकों को कार्य नहीं मानें तो महत्तत्त्व को प्रकृति वा पुरुष इन दोनों से एक अवश्य माना जायगा ; क्योंकि जो महदादि परिणामी हों तो प्रकृति, और महदादि अपरिणामी ही को पुरुष मानना पड़ेगा ।