भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ५७ ) प्र०-प्रकृति और पुरुष से भिन्न अर्थात् दूसरा और कोई पदार्थ मान लिया जाय तो क्या हानि है ? उ०-तयोरन्यत्वे तुच्छत्वम् ॥ १३४ ॥ अर्थ-हाँ ! हानि है, तुच्छत्व दोष की प्राप्ति होती है; क्योंकि लोक में प्रकृति और पुरुष के सिवाय अन्य को अवस्तु माना है अर्थात् प्रकृति और पुरुष यह दोही वस्तु हैं और सब अवस्तु हैं ; अतएव इसको प्रकृति का कार्य मानना चाहिये । यदि दूसरा मानें तो इसके कारण भी दूसरे ही मानने पड़ेंगे । इस प्रकार महदादिकों को कार्यत्व सिद्ध हुआ । अब उनके द्वारा प्रकृति का अनुमान सिद्ध करते हैं । कार्यात् कारणानुमानं तत्साहित्यात् ॥ १३५ ॥ अर्थ-कार्य से कारण का अनुमान होता है ; क्योंकि जहाँ- जहाँ कार्य होता है, वहीं-वहीं कारण भी होता है, और महदादिक भी अपने कार्यों के उपादान कारण हैं, जैसेकि तिलरूप कार्य स्वगत ( अपने में रहने वाले ) तेल का उपादान कारण है । इस कथन से महदादिकों के कार्यत्व में किसी प्रकार की हानि नहीं है । अव्यक्तं त्रिगुणाल्लिङ्गात् ॥ १३६ ॥ अर्थ-महत्तत्वादिकों की अपेक्षा भी मूल कारण प्रकृति अव्यक्त अर्थात् सूक्ष्म है ; क्योंकि महत्तत्त्व के कार्य सुखादिकों का प्रत्यक्ष होता है, और सूक्ष्मता के कारण प्रकृति का कोई गुण प्रत्यक्ष नहीं होता है । प्र०-प्रकृति तो परम सूक्ष्म है, अतः उसका न होना ही सिद्ध होता है ? उ०-तत्कार्यतस्तत्सिद्धेर्नापलापः ॥१३७॥ अर्थ-प्रकृति का अभाव ( न होना ) नहीं हो सकता ; क्योंकि प्रकृति की सिद्धि ( होना ) मालूम पड़ती है । उसके