सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
( ५३ ) उत्पत्ति की पूर्व दशा को प्रागभाव और कार्य के कारण में लय होजाने को ध्वंस कहते हैं, और इन दोनों अवस्थाओं में कार्य का अभाव मानते हैं, और इसी प्रकार सत्कार्यवादी कही हुई दोनों अवस्थाओं को अनागत और अतीत कहते हैं, तथा उन अवस्थाओं में कार्य का भाव मानते हैं, कार्य से कारण का अनुमान कर लेना चाहिए । प्र०-किस-किस को कार्य कहते हैं ? उ०-हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रित लिङ्गम् ॥ १२४ ॥ हेतुमान् अर्थात् कारणवाला, अनित्य अर्थात् हमेशा एकसा जो न रहे, अव्यापि अर्थात् एक देश में रहनेवाला, सक्रिय क्रिया की अपेक्षावाला, अनेक जिसके अलग-अलग भेद मालूम होवें, आश्रित कारण के अधीन इसको लिङ्ग अर्थात् कार्य के पहिचानने का चिह कहते हैं । प्र०-जिसमें हेतुमत्वादिक होते हैं वही प्रधान के लिङ्ग कहे जाते हैं ? उ०-तुम्हारा यह कहना सर्वथा असंगत है ; क्योंकि प्रथम तो इस सूत्र में वा पूर्व सूत्र में प्रधान का नाम ही नहीं है, दूसरे सांख्यकार ने प्रधान शब्द को रूढ़ि नहीं माना, इसी कारण इसको पुरुषवाचक भी कह सकते हैं; किन्तु प्रकृतिवाचक है । तीसरे यदि उनके तात्पर्यानुसार ( मतलब के माफ़िक़ ) यह लिङ्ग पुरुष के ही मान लिये जावें तो भी ठीक नहीं, क्योंकि सांख्यकार के मत में कार्यमात्र की उत्पत्ति प्रकृति से है, एवं प्रकृति और पुरुष का भेद भी माना है, एवं परस्परानपेक्षा भी कपिलाचार्य का सिद्धांत है, तो प्रकृति से पुरुष का अनुमान नहीं हो सकता।
( ५४ ) हेतुमत्वादि विशेषण देने से कार्य कारण में भेद मालूम होता है, इसी कारण उस भेद की प्रतीति में प्रमाण देते हैं— आञ्जस्याद् भेदतो वा गुण सामान्यादेस्तत्सिद्धिः प्रधानव्यपदेशाद्वा ॥ १२५ ॥ अर्थ—आञ्जस्य ( प्रत्यक्ष ) से, वा कारण के सामान्य गुण कार्य में पाये जाते हैं। विशेष गुणों में भेद रहता है, इससे प्रधान व्यपदेश से अर्थात् यह कारण है, यह कार्य है। इस लौकिक व्यवहार से कार्य कारण के भेद की सिद्धि होती है। त्रिगुणचेतनत्वादि द्वयोः ॥ १२६ ॥ अब कार्य कारण का भेद कहकर कार्य कारण का साधर्म्य, अर्थात् बराबरीपन कहते हैं—कि सत्, रज, तम यह तीनों गुण अचेतनत्वादि धर्म दोनों के समान ही हैं, आदि शब्द से परिणामित्वादि का ग्रहण होता है। प्रीत्य प्रीति विषादाद्यैर्गुणा नामन्योन्य वैधर्म्यम् ॥ १२७ ॥ अर्थ—अब कार्य कारण का परस्पर ( आपस में ) वैधर्म्य कहते हैं—सत्व, रज, तम, इन गुणों का सुख दुःख मोह इनमें अन्योऽन्य वैधर्म्य ( एक ही कारण से अनेक-अनेक प्रकार के कार्य की उत्पत्ति होना ) दिखाई पड़ता है। इस सूत्र में आदि शब्द से जिनका ग्रहण होता है, उनका वर्णन पञ्चशिखाचार्य ने इस प्रकार किया है कि सत्वगुण से प्रीति, तितिक्षा, सन्तोष आदि सुखात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं। इस ही रीति से रजोगुण से अप्रीति शोक आदि दुःखात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं, एवं तम से विषाद, निद्रा ( नींद ) आदि मोहात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य
( ५५ ) पैदा होते हैं। घटरूप कार्य में केवल मिट्टी से रूपमात्र का ही वैधर्म्य है। लघ्वादिधर्मैः साधर्म्यं वैधर्म्यञ्चगुणानाम् ॥१२८॥ अर्थ—लघुत्वादि धर्मों से सत्त्वादि गुणों का साधर्म्य और वैधर्म्य है; जैसे लघुत्व के साथ सर्व सत्वव्यक्तियों का ( सतोगुण के पदार्थों का साधर्म्य है, रज और तम का वैधर्म्य है, एवं चंचलत्वादि के साथ रजो व्यक्तियों का ( रजोगुण के पदार्थों का ) साधर्म्य है, और सत्व तम का वैधर्म्य है, इस ही प्रकार गुरुत्व आदि के साथ तमोव्यक्तियों का ( तमोगुण के पदार्थों का ) साधर्म्य है, और सत्व, रज से वैधर्म्य है। प्र०—यद्यपि महदादि स्वरूप से सिद्ध हैं तो भी प्रत्यक्ष से उनकी उत्पत्ति नहीं दीखती, इसी कारण महदादिकों के कार्य होने में कोई भी प्रमाण नहीं ? उ०—उभयान्यत्वात् कार्यत्वं महदादेर्घटा- दिवत् ॥ १२९ ॥ प्रकृति और पुरुष इन दोनों से महदादिक और ही हैं, इस सबब उन्हें कार्य मानना चाहिये, जैसे—घट मट्टी से अलग है इसी सबब कार्य है, क्योंकि मट्टी कहने से न तो घट का बोध होता है, और न घट कहने से मिट्टी का ही ज्ञान होता है। इसी प्रकार प्रकृति और पुरुष कहने से महदादिकों का भी ज्ञान नहीं होता। इस कारण महदादिकों को प्रकृति और पुरुष से भिन्न कार्य मानना चाहिये; क्योंकि प्रकृति और पुरुष कारण हैं, किन्तु कार्य नहीं हैं। परिणामात् ॥ १३० ॥ अर्थ—प्रकृति और पुरुष परिमित भाव से रहते हैं, कभी घटते बढ़ते नहीं। इसी सबब उनको कार्य नहीं कह सकते; क्योंकि—
( ५६ ) समन्वयात् ॥ १३१ ॥ अर्थ—मन को आदि लेके जोकि महदादिकों का अवान्तर भेद हैं, सो अन्नादिकों के मिलने से बढ़ते रहते हैं, और भूखे रहने से क्षीण होते हैं । इस पूर्वोक्त समन्वय से भी महदादिकों को कार्यत्व मालूम होता है ; क्योंकि जो नित्य पदार्थ होता है वह अवयव ( टुकड़ा ) रहित होता है, अतः उसका घटना-बढ़ना नहीं हो सकता । इसका अर्थ यह हुआ कि घटना-बढ़ना आदि कार्य में हो सकता है, कारण में नहीं हो सकता । मन आदि अन्न के मिलने से बढ़ते हैं, और न मिलने से घटते हैं। इसी से महदादिकों का कार्यत्व सिद्ध होता है । शक्तितश्चेति ॥ १३२ ॥ अर्थ—महदादिक पुरुष के कारण हैं, इसी में महदादिकों को कार्यत्व है, क्योंकि इनके बिना पुरुष कुछ नहीं कर सकता, जैसेकि नेत्रों के बिना कुछ नहीं कर सकता, अर्थात् देख नहीं सकता, और पुरुष के बिना नेत्र में देखने की शक्ति नहीं हो सकती ; क्योंकि नेत्र तो जड़ हैं, इस कारण मनुष्य दर्शन रूप क्रिया को नेत्ररूपी कारण के बिना नहीं कर सकता, इस ही सबब से नेत्रादिकों को कार्यत्व माना है । इस सूत्र में इति शब्द से यह जानना चाहिये कि प्रत्येक कार्य की सिद्धि में इतने ही प्रमाण होते हैं । तद्धाने प्रकृतिः पुरुषो वा ॥ १३३ ॥ अर्थ—महदादिकों को कार्य नहीं मानें तो महत्तत्त्व को प्रकृति वा पुरुष इन दोनों से एक अवश्य माना जायगा ; क्योंकि जो महदादि परिणामी हों तो प्रकृति, और महदादि अपरिणामी ही को पुरुष मानना पड़ेगा ।
( ५७ ) प्र०-प्रकृति और पुरुष से भिन्न अर्थात् दूसरा और कोई पदार्थ मान लिया जाय तो क्या हानि है ? उ०-तयोरन्यत्वे तुच्छत्वम् ॥ १३४ ॥ अर्थ-हाँ ! हानि है, तुच्छत्व दोष की प्राप्ति होती है; क्योंकि लोक में प्रकृति और पुरुष के सिवाय अन्य को अवस्तु माना है अर्थात् प्रकृति और पुरुष यह दोही वस्तु हैं और सब अवस्तु हैं ; अतएव इसको प्रकृति का कार्य मानना चाहिये । यदि दूसरा मानें तो इसके कारण भी दूसरे ही मानने पड़ेंगे । इस प्रकार महदादिकों को कार्यत्व सिद्ध हुआ । अब उनके द्वारा प्रकृति का अनुमान सिद्ध करते हैं । कार्यात् कारणानुमानं तत्साहित्यात् ॥ १३५ ॥ अर्थ-कार्य से कारण का अनुमान होता है ; क्योंकि जहाँ- जहाँ कार्य होता है, वहीं-वहीं कारण भी होता है, और महदादिक भी अपने कार्यों के उपादान कारण हैं, जैसेकि तिलरूप कार्य स्वगत ( अपने में रहने वाले ) तेल का उपादान कारण है । इस कथन से महदादिकों के कार्यत्व में किसी प्रकार की हानि नहीं है । अव्यक्तं त्रिगुणाल्लिङ्गात् ॥ १३६ ॥ अर्थ-महत्तत्वादिकों की अपेक्षा भी मूल कारण प्रकृति अव्यक्त अर्थात् सूक्ष्म है ; क्योंकि महत्तत्त्व के कार्य सुखादिकों का प्रत्यक्ष होता है, और सूक्ष्मता के कारण प्रकृति का कोई गुण प्रत्यक्ष नहीं होता है । प्र०-प्रकृति तो परम सूक्ष्म है, अतः उसका न होना ही सिद्ध होता है ? उ०-तत्कार्यतस्तत्सिद्धेर्नापलापः ॥१३७॥ अर्थ-प्रकृति का अभाव ( न होना ) नहीं हो सकता ; क्योंकि प्रकृति की सिद्धि ( होना ) मालूम पड़ती है । उसके
( ५८ ) कार्य्य महदादिक उसको सिद्ध कर रहे हैं। यहाँ तक प्रकृति का अनुमान समाप्त हुआ। अब अध्याय की समाप्ति तक पुरुष का अनुमान कहेंगे। सामान्येन विवादाभावाद्धर्म वन्न साधनम् ॥१३८॥ अर्थ--जिस वस्तु में सामान्य ही से विवाद नहीं है उसकी सिद्धि में साधनों की कोई अपेक्षा नहीं, जैसे-प्रकृति में सामान्य ही से विवाद है, उसकी सिद्धि के वास्ते साधनों की अपेक्षा आवश्यकता है, वैसे पुरुष में नहीं है; क्योंकि बिना चेतन के संसार में अँधेरा प्रतीत ( मालूम ) होगा, यहाँ तक कि बौद्ध भी सामान्यतः कर्म भोक्ता अहं पदार्थ को पुरुष मानते हैं, तो उसमें किसी प्रकार का विवाद नहीं हो सकता। उदाहरण, धर्मवत्- धर्म की तरह, जैसे कि धर्म को सभी बौद्ध नास्तिक आदि मानते हैं, वैसे ही एक चेतन को सभी मानते हैं। प्र०--पुरुष किसको कहते हैं ? उ०--शरीरादिव्यतिरिक्तः पुमान् ॥ १३६ ॥ अर्थ--शरीर को आदि से लेकर प्रकृति तक जो २३ पदार्थ हैं उनसे जो पृथक् है उसका नाम पुरुष है। प्र०--शरीरादि से जो भिन्न है उसका ही नाम पुरुष है। इसमें क्या हेतु है ? उ०--संहतपदार्थत्वात् ॥ १४० ॥ जैसे शय्या आदिक संहत पदार्थ दूसरे के वास्ते सुख के देने वाले होते हैं, अपने वास्ते नहीं। इसी प्रकार प्रकृत्यादिक पदार्थ भी दूसरे के वास्ते हैं। स्पष्ट आशय यह है, कि प्रकृति आदि जितने संहत पदार्थ हैं, वह किसी दूसरे के वास्ते हैं, और जो वह दूसरा है, उसी का नाम पुरुष है, और संहत देहादि से
( ५६ ) भिन्न का नाम पुरुष है। यह पहले भी कह आये हैं, फिर यहाँ कहना हेतुओं की केवल गिनती बढ़ानी है। प्र०—पुरुष को प्रकृति ही क्यों न माना जाय, इसमें क्या कारण है ? उ०—त्रिगुणादिविपर्ययात् ॥ १४१ ॥ अर्थ—त्रिगुण अर्थात् सत्, रज, तम, मोह आदि शब्द से जड़त्वादि, इनसे विपरीत होने से पुरुष प्रकृति नहीं हो सकता, अर्थात् वह प्रकृति से भिन्न है; क्योंकि त्रिगुणत्व विशिष्ट का नाम प्रकृति है, अर्थात् सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण; इन से जिसका सम्बन्ध है, उसका ही नाम प्रकृति माना है, और जिसमें नित्यत्व, शुद्धत्व, बुद्धत्व मुक्तत्व, यह धर्म हैं, उसका ही नाम पुरुष है, तो विचारना चाहिये प्रकृति और पुरुष में कितना भेद है। इस ही कारण पुरुष को प्रकृति नहीं मान सकते हैं। अधिष्ठानाच्चेति ॥ १४२ ॥ अर्थ—और भी कारण है, पुरुष अधिष्ठान होने से प्रकृति से जुदा ही है। अधिष्ठान अधिष्ठेय संयोग से मालूम पड़ता है, कि दो के बिना संयोग हो ही नहीं सकता। इससे सिद्ध हुआ कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है। आशय यह है कि जब प्रकृति को आधार कहते हैं, तब उसमें आधेय भी अवश्य होना चाहिये वह आधेय पुरुष है। प्र०—अधिष्ठान किसको कहते हैं ? उ०—आधार को। प्र०—आधार शब्द का क्या अर्थ है ? उ०—रखने की जगह, जैसे पात्र। प्र०—अधिष्ठेय किसको कहते हैं ? उ०—आधेय को।
( ६० ) प्र०—आधेय शब्द का क्या अर्थ है ? उ०—रखने की वस्तु को आधेय कहते हैं, जैसे—घृत "घी"। भोक्तृ भावात् ॥ १४३ ॥ अर्थ—यदि यह कहो शरीरादिक ही भोक्ता है, तो कर्ता और कर्म का विरोध होता है; क्योंकि आप ही अपने को भोग नहीं सकता, अर्थात् शरीरादिक प्रकृति के कार्य्य हैं, और स्रक्चन्दना- दिक भी प्रकृति के कार्य्य हैं। इस कारण आप अपना भोग नहीं कर सकता । कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ १४४ ॥ अर्थ—यदि शरीरादिक को ही भोक्ता माना जायगा, तो दूसरा दोष यह भी होगा कि मोक्ष के उपाय करने में किसी की प्रवृत्ति न होगी, क्योंकि शरीरादि के विनाश होने से आप ही मोक्ष होना सम्भव है, और तीसरा दोष यह होगा, कि सुख दुःखादि प्रकृति के स्वाभाविक धर्म हैं, और स्वभाव किसी का नाश नहीं होता, इस कारण मोक्ष असम्भव है, इससे पुरुष को ही भोक्ता मानना ठीक है। पूर्व कहे हुए प्रमाणों से पुरुष को २३ तत्त्वों से भिन्न कह चुके, अब पुरुष क्या वस्तु है, यह विचार करते हैं। जड प्रकाशाऽयोगात् प्रकाशः ॥ १४५ ॥ इस विषय में वैशेषिक कहते हैं कि प्रकाशस्वरूप आत्मा मन के संयोग होने से बाह्य ज्ञान से युक्त होता है और पर- मात्मा प्रकाशमय है, जड़ प्रकृति से प्रकाशमय नहीं हो सकता । लोक में जड़ ( प्रकाश रहित ) काष्ठ लोष्टादिक है, और इनमें प्रकाश किसी तरह नहीं देखने में आता । इस कारण सूर्यादिक के समान प्रकाशरूप पुरुष जानना चाहिये । प्र०--प्रकाशस्वरूप आत्मा में तमादि गुणों का भाव है, या नहीं ?
( ६१ ) निर्गुणत्वान्नचिद्धर्मा ॥ १४६ ॥ उ०—नहीं ! कारण यह है, कि पुरुष निर्गुण है, इसी सयब चित्, सत्, रजादि गुणवाला नहीं हो सकता ; क्योंकि गुण प्रकृति के धर्म हैं । प्र०—बहुत तीन गुण पुरुष में मानकर उसको शिव, विष्णु, ब्रह्मा कहते हैं ? उ०—श्रुत्या सिद्धस्य नापलापः सत्प्रत्यक्ष वाधात् ॥ १४७ ॥ अर्थ—यद्यपि उक्त कथन से पुरुष में गुण कल्पना किया जाता है, लेकिन युक्ति और श्रुति इन दोनों से विरुद्ध है, क्योंकि श्रुतियों में भी “साक्षी चेता केवलोनिर्गुणश्च” इत्यादि विशेषणों से पुरुष को निर्गुण ही प्रतिपादन किया है । एवं उस अनुभव प्रत्यक्ष में दोष भी हो सकता है, क्योंकि वह अनुभव किसको होगा । यदि पुरुष को होगा, तो ज्ञान को पुरुष से पृथक् वस्तु मानना पड़ेगा । इस कारण पुरुष निर्गुण है । प्र०—जो पुरुष प्रकाशस्वरूप ही है, तो सुषुप्ति आदि अवस्थाओं की कल्पना नहीं हो सकती, क्योंकि उन अवस्थाओं में प्रकाशस्वरूपता नहीं रहती । यह जीव पर शङ्का है ? उ०—सुषुप्त्याद्यसाक्षित्वम् ॥ १४८ ॥ अर्थ—पुरुष सुषुप्ति का आद्य साक्षी है, अर्थात् जिन अन्तः- करण की वृत्तियों का नाम सुषुप्ति है, वह अन्तःकरण पुरुष के आश्रय है । इसी कारण उस सुषुप्ति का साक्षी पुरुष है, और सुषुप्ति अन्तःकरण का धर्म है । प्र०—यदि पुरुष प्रकाशस्वरूप है, और अन्तःकरण वृत्तियों का आश्रय है, तो वह पुरुष एक है वा अनेक ?
( ६२ ) उ०—जन्मादिव्यवस्थातः पुरुषबहुत्वम् ॥१४९॥ संसार में जन्म को आदि लेकर अनेक अवस्था देखने में आती हैं, तो इससे ही सिद्ध होता है, कि पुरुष बहुत हैं; क्योंकि यदि सब अन्तःकरण की वृत्तियों का आधार एक ही पुरुष होता, तो यह घट है, इस घट को मैं जानता हूँ, इस घट को मैं देखता हूँ। इस प्रकार का अनुभव जिस क्षण में एक अन्तःकरण को होता है, उसी क्षण में सब अन्तःकरणों को होना चाहिये; क्यों- कि वह एक ही सबका आश्रयी है, लेकिन संसार में ऐसा देखने में नहीं आता, इस कारण पुरुष अनेक हैं, और जो कोई-कोई टीकाकार इस सूत्र का यह अर्थ करते हैं कि जन्मादि व्यवस्था ही से बहुत से पुरुष प्रतीत (मालूम) होते हैं वस्तुतः नहीं। उनका कहना इस कारण अयोग्य है "पुण्यवान् स्वर्गं जायते, पापी नरके, अज्ञोबध्यते, ज्ञानी मुच्यते।" पुण्यात्मा स्वर्ग में पैदा होता है, और पापी नरक में पैदा होता है; अज्ञ बन्धन को प्राप्त होता है, ज्ञानी मुक्त होता है, इत्यादि श्रुतियां बहुत्व (बहुत सारों) को प्रतिपादन (सुबूत) करती हैं उनसे विरोध होगा। प्र०—एक पुरुष की ही अनेक जन्मादि व्यवस्था हो सकती हैं, या एक पुरुष की एक ही जन्मादि व्यवस्था है ? उ०—उपाधि भेदेप्येकस्य नानायोग आकाश- स्येव घटादिभिः ॥ १५० ॥ अर्थ—उपाधिभेद (शरीरादि) होने पर भी एक पुरुष का अनेक जन्मों में अनेक शरीरों से योग- (मेल) होता है; जैसेकि एक आकाश का घटादिकों के साथ योग होता है। (खुलासा) एक ही पुरुष जन्मान्तर में अनेक उपाधियों को धारण करता है, और अनेक योग वाला कहाता है, आकाश के
( ६३ ) समान ; जैसेकि आकाश एक ही है, लेकिन जब घट के साथ योग को प्राप्त होता है, तो घटाकाश कहलाता है, और मठ के साथ योग को प्राप्त होता है, तो मठाकाश कहलाता है ; लेकिन वे उपाधियाँ आकाश को एक ही समय और एक ही देश में एक साथ नहीं हो सकतीं, अर्थात् जितने स्थान आकाश का नाम मठाकाश है, उस वक्त उस ही आकाश का नाम घटाकाश किसी प्रकार नहीं हो सकता, किन्तु मठ की उपाधि को नाश करके दूसरे वक्त घट के स्थापन होने पर घटाकाश कह सकते हैं । इस प्रकार ही पुरुष भी एक देश काल में अनेक उपाधियों (शरीरादि) को नहीं धारण कर सकता है, किन्तु अनेक काल में अनेक उपाधियों को धारण करके नाना योग वाला कहने में आता है, अर्थात् एक ही जीव कभी मनुष्य, कभी पशु, पक्षी आदि नाना प्रकार के शरीर धारण करके एक ही रहता है । इस ही प्रकार अनेक जीव अनेक उपाधियों को धारण करते हैं, यह ज्ञानियों को ही अनुभव हो सकता है, और भी इस ही विषय में कहते हैं । उपाधिर्भिद्यते न तु तद्वान् ॥ १५१ ॥ अर्थ—उपाधि के बहुत से रूप होते हैं और उपाधि को ही नानारूपों से बोलते हैं, लेकिन उपाधि वाला पुरुष एक ही है । यद्यपि अनेक नव्य (नवीन) वेदान्त शास्त्र के जानने वाले यह कहा करते हैं, कि एक ही आत्मा का कार्य कारण उपाधि में प्रतिविम्ब के पड़ने से जीव ईश्वर का भेद है, और प्रति- विम्ब आपस में जुदे होने से जन्मादि व्यवस्था भी हो सकती है । यह उनका कथन इस प्रकार अयोग्य है, इसमें भेद और अभेद की कोई कल्पना नहीं हो सकती; क्योंकि विम्ब (परछाईं वाला), प्रतिविम्ब (परछाईं), इन दोनों की बिना अलहदगी माने विम्ब, प्रतिविम्ब भाव हो ही नहीं सकता, और जीव को ब्रह्म का प्रति-
( ६४ ) विम्व मानते हैं, तो देखते हैं, कि प्रतिबिम्ब जड़ है। अतएव पुरुष को भोक्ता, बद्ध, मुक्त, कभी नहीं कह सकते हैं, और जीव, ब्रह्म को एकता के विषय में हानि प्राप्त होगी। अतएव सांख्य मतानुसार, जीव, ब्रह्म को एक मानना भी नहीं हो सकता है। एक ही ब्रह्म जीव रूप को धारण करता है इस पक्ष का खण्डन इस सूत्र से होता है— एवमैकत्वेन परिवर्तमानस्य न विरुद्ध धर्मा- ध्यासः ॥ १५२ ॥ अर्थ—यदि एक ही ब्रह्म सम्पूर्ण उपाधियों से मिलकर जीव रूप हो जाता है, तो उसमें विरुद्ध धर्म दुःख बन्धनादि का अध्यास अवश्य होगा, इस कारण जीव, ब्रह्म को एक मानना योग्य नहीं है। प्र०—जबकि पुरुष को निर्धर्म कह चुके, तब, जन्म, मरण, मोक्ष, बन्ध आदि धर्म क्योंकर हो सकते हैं ? उ०—यह धर्म परिणामी नहीं है, जैसे—स्फटिक मणि के पास काला, पीला, हरा इत्यादि रङ्गों के रख देने से वह मणि भी नीली, पीली, काली दीखने लगती है, लेकिन मणि तो वास्तव में सफेद ही है, इस प्रकार ही पुरुष में भी मन के धर्म सुख, दुःखादि शरीर के धर्म, पिता, पुत्रादि प्रतीत होते हैं। अन्यधर्मत्वेपि नारोपात् तत्सिद्धेरेकत्वात् ॥१५३ अर्थ—मन आदिकों का धर्म जो सुख, दुःखादि उस धर्म का पुरुष में आरोप करने पर भी पुरुष को परिणामित्व की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि सुख, दुःखादि पुरुष के धर्म नहीं हैं, किन्तु मत के धर्म हैं। पुरुष जन्मान्तर में एक ही बना रहता है। जब हर एक शरीर में एक-एक पुरुष है तो नाना पुरुष सिद्ध हुए
( ६५ ) और “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” इत्यादिक अद्वैत प्रतिपादक श्रुतियों से विरोध होगा ? उ०—नाद्वैतश्रुति विरोधो जातिपरत्वात् ॥१५४॥ अर्थ—अद्वैत को प्रतिपादन (सिद्ध) करनेवाली श्रुतियों से विरोध न होगा, क्योंकि वहाँ पर अद्वैत शब्द जाति पर है ; जैसे—एक आदमी के समान कोई नहीं है, जैसा कि संसार में देखने में आता है, कि अमुक पुरुष अद्वितीय है। इसका आशय यह है, कि उसके समान दूसरा और कोई नहीं है। इस ही प्रकार ईश्वर को भी अद्वैत व अद्वितीय कहते हैं। प्र०—जिस रीति से अद्वैत श्रुतियों का विरोध दूर करने के वास्ते ईश्वर में अद्वैत शब्द जाति पर कहा है, उस प्रकार ही पुरुष को भी ईश्वर का ही रूपान्तर क्यों नहीं मानते ? उ०—विदितबन्धकारणस्यदृष्ट्यातद्रूपम् ॥१५५॥ अर्थ—मनुष्य के बन्ध आदि कारण सब विदित हैं, और ईश्वर नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप है, इस कारण ईश्वर का रूपान्तर नहीं हो सकता । प्र०—यदि जीव ईश्वर का रूपान्तर नहीं है, तो अनेक शरीर धारण करने पर भी एक ही पुरुष रहता है, इसमें क्या प्रमाण है ? उ०—नान्धदृष्ट्याचक्षुष्मतामनुपलम्भः ॥१५६॥ अर्थ—जो पदार्थ अन्धे को नहीं दीखे, उसका अभाव नेत्र- वान् मनुष्य कदापि नहीं कह सकता ; क्योंकि उसकी नेत्रेन्द्रिय की शक्ति नष्ट हो गई है, इस कारण उसको दीख नहीं सकता, और चक्षुष्मान् के नेत्रेन्द्रिय की शक्ति वर्त्तमान है, इस कारण वह अभाव नहीं कह सकता ।
( ६६ ) वामदेवादिर्मुक्को नाद्वैतम् ॥ १५७ ॥ अर्थ—यद्यपि वामदेवादिक मुक्त होगये, लेकिन अद्वैत स्वरूप तो नहीं हुये ; क्योंकि यदि मुक्त जीव सब ही अद्वैतस्वरूप हो जाते तो आजतक सहज-सहज सब पुरुष अद्वैत होकर पुरुष का नाममात्र भी न रहता । प्र०—वामदेवादिकों का परम मोक्ष नहीं हुआ ? उ०—अनादावद्ययावदभावाद्भविष्यदप्येवम्।१५८ अर्थ—अनादि-काल से लेकर आजतक जो बात नहीं हुई है वह भविष्यत्-काल में भी न होगी, यही नियम है। इससे यह सिद्ध होता है, कि अनादि-काल से लेकर आजतक कोई भी पुरुष मुक्त होकर ब्रह्म नहीं हुआ ; क्योंकि पुरुषों की संख्या कमती देखने में नहीं आती, और नई पुरुषों की उत्पत्ति मानी नहीं गई है, तो भविष्यत्-काल में भी ऐसा ही होगा। अब मोक्ष के विषय में सांख्यकार अपना सिद्धान्त ( निश्चय ) कहते हैं। इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः ॥ १५६ ॥ अर्थ—इस वर्त्तमान-काल के दृष्टान्त से यह जानना चाहिये कि पुरुष के बन्धन का किसी समय में भी अत्यन्त उच्छेद नहीं हो सकता। इसका मतलब यह है, कि कोई भी पुरुष ऐसा मुक्त नहीं है, कि फिर उसका कभी बन्धन न हो सके और इससे यह भी मालूम होता है, कि मुक्त पुरुष का फिर भी जन्म होता है। प्र०—मोक्ष का क्या स्वरूप है ? उ०—व्यावृत्तोभयरूपः ॥ १६० ॥ अर्थ—मुक्ति संसार के दुःख-सुख दोनों ही से विलक्षण है, अर्थात् मुक्ति में पुरुष को शान्त सुख होता है, यह स्वरूप है। प्र०—जबकि पुरुष को साक्षी कह चुके वह साक्षीपन मोक्ष समय में नहीं रह सकता ; क्योंकि वहां मनादि का
( ६७ ) अभाव है, तो पुरुष सदा एक रूप रहता है, यह कहना भी असंगत हुआ ? उ०—साक्षात् संबंधात् साक्षित्त्वम् ॥ १६१ ॥ अर्थ—पुरुष को जो साक्षित्व कहा है, वह मन आदि के साथ साक्षात् सम्बन्ध में कहा है, किन्तु वास्तव में पुरुष साक्षी नहीं है ; क्योंकि पाणिनिमुनि ने साक्षी शब्द का ऐसा अर्थ किया है “साक्षाद्द्रष्टिर संज्ञायाम्” । इस सूत्र से साक्षी शब्द निपातन किया है, कि जितने समय में निरन्तर देखता है उतने ही समय में उसकी साक्षी संज्ञा है। इससे यह सिद्ध होता है, कि जितने समय तक पुरुष का मन से सम्बन्ध रहता है, उतने ही समय तक पुरुष की साक्षी संज्ञा रहती है, अथवा मन के संसर्ग ( मेल ) से पुरुष में दुःख-सुख आदि को माना जाय, तो पुरुष को वास्तव में दुःखादि से मुक्त होने में यह दोष होगा कि— नित्यमुक्तत्वम् ॥ १६२ ॥ अर्थ—यदि पुरुष को नित्यमुक्त मानें, तो मुक्ति का साधन करना व्यर्थ होता है, और मुक्ति प्रतिपादक जो श्रुतियाँ हैं उन- में भी दोषारोपण होगा, और इस सूत्र के अर्थ में जो विज्ञान- भिक्षु ने ( नित्यमुक्तत्वम् ) यह पुरुष को विशेषण दिया है, अर्थात् पुरुष को नित्य मुक्त माना है । यह कथन इस कारण अयोग्य है, कि “इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः” । इस सूत्र से पुरुष का अनित्य मुक्त कपिलाचार्य ने मानी है । इससे यहाँ विरोध होगा । उन टीकाकारों ने यह न सोचा, क्या उन ऋषियों की बुद्धि मनुष्यों की बुद्धि की तरह क्षणिक होती है, कि कभी कुछ कहें, कभी कुछ कहें, जबकि उक्त सूत्र “इदानीमित्यादि” से पुरुष को अनित्य मुक्त प्रतिपादन कर चुके, फिर नित्य-मुक्त कैसे कह सकते हैं और पूर्वोक्त टीकाकार के कथन में इस कारण से भी
( ६८ ) अयोग्यता है कि जो दोष कपिलाचार्य को अपने कहे हुये विशेषणों से दीखे, उनके दुरुस्त करने के लिये "साक्षात् सम्बन्धात् साक्षित्त्वम्" यह सूत्र फिर कहा, इसी प्रकार "नित्य मुक्तत्वम्" और "औदार्य सीत्वम्," यह दो तरह के दोष आवेंगे, उनका; समाधान इस अध्याय के अन्तिम से सिद्ध कर दिया गया है, इस ही कारण "नित्य मुक्तत्वम्" और "औदार्य सीन्यज्योति," यह दोनों सूत्र दोष के दिखानेवाले हैं। औदासीन्यज्योति ॥ १६३ ॥ अर्थ—और पुरुष को वास्तव में मुक्त मानैं तो औदासीन्य दोष होगा, क्योंकि पुरुष का किसी से सम्बन्ध ही नहीं है, तो वह किसी कर्म का कर्त्ता क्यों होगा। जब किसी कर्म का कर्त्ता तो रहा ही नहीं तो बन्धन आदि में क्यों पड़ेगा, तब उसमें औदासीन्य दोष होगा। इस सूत्र का भाव और पुरुष को कर्त्तृत्व अगले सूत्र से प्रतिपादन करेंगे। प्र०—"औदासीन्यज्योति" इस सूत्र में 'इति' शब्द क्यों है ? उ०—यह इस वास्ते है, कि पुरुष की सिद्धि में दोष आदि का खण्डन कर चुके। उपरागात्कर्त्तृत्वंचित्सान्निध्यात् चित्सान्नि- ध्यात् ॥ १६४ ॥ अर्थ—पुरुष में जो कर्त्तृत्व है, सो मन के उपराग से है, और मन में जो चित्-शक्ति है, वह पुरुष के संसर्ग से है। यहाँ- पर जो "चित्सान्निध्यात्" यह दो बार कहा है सो अध्याय की समाप्ति का जतानेवाला है और इस अध्याय में शास्त्र के मुख्य चार ही अर्थ कहे गये हैं "हेय" त्यागने के लायक, "हान" त्यागना। "हेय" और "हान" और इन दोनों के हेतु। इति सांख्यदर्शने प्रथमोऽध्यायः समाप्तः।
द्वितीयोऽध्यायः
( ६६ ) द्वितीयोऽध्यायः शास्त्र का तो विषय निरूपण कर चुके, अब पुरुष को अपरि- माणित्व ठहराने के वास्ते प्रकृति से सृष्टि का होना, विस्तार से द्वितीयोऽध्याय में कहेंगे और इसही दूसरे अध्याय में प्रधान के जो कार्य हैं, उनके स्वरूप को भी विस्तार से कहना है ; क्योंकि प्रकृति के कार्यों से पुरुष का ज्ञान अच्छी तरह से होता है। कारण यह है, कि प्रकृति के कार्यों के बिना ज्ञान हुए मुक्ति किसी प्रकार नहीं हो सकती, अर्थात् जब तक पुरुष, प्रकृति और प्रकृति के कार्य, इन तीनों का अच्छी तरह ज्ञान नहीं हो सकता तबतक मुक्ति भी न होगी; किन्तु उनके जानने ही से मुक्ति होती है। प्र०--अपरिमाणित्व किसको कहते हैं ? उ०--जो परिमाण को प्राप्त न हो। यदि अचेतन प्रकृति निष्प्रयोजन सृष्टि को उत्पन्न करती है, तो मुक्त को भी बन्ध की प्राप्ति हो सकती है। इस आशय को विचार करके सृष्टि के उत्पन्न होने का प्रयोजन इस सूत्र में कहते हैं। विमुक्तमोक्षार्थं स्वार्थं वाप्रधानस्य ॥ १ ॥ अर्थ—पुरुष में जो अहंकार के संबन्ध से दुःख मालूम पड़ता है, उसकी मुक्ति के वास्ते अथवा स्वार्थ अर्थात् पुरुष के सम्बन्ध से जो मन आदि को दुःख होते हैं, उनके दूर करने के लिये प्रधान अर्थात् प्रकृति को कर्तृत्व है, और इस सूत्र में कर्तृत्व शब्द पहिले सूत्र से लाया गया है।
( ७० ) प्र०—यदि मोक्ष के वास्ते ही सृष्टि होती है, तो एक बार की ही सृष्टि से सब पुरुषों को मोक्ष हो जाता, बारम्बार सृष्टि के होने का क्या कारण है ? उ०—विरक्तस्य तत्सिद्धेः ॥ २ ॥ अर्थ—एक बार की सृष्टि से मोक्ष नहीं होता, किन्तु बहुत से जन्म, मरण, व्याधि आदि नाना प्रकार के [ सैकड़ों ] दुःखों से अत्यन्त [ बहुत ] तप्त [ दुःखित ] होने पर जब प्रकृति पुरुष का ज्ञान पैदा होता है तब वैराग्य द्वारा मोक्ष होता है और वह वैराग्य एक बार की सृष्टि से आजतक किसी को उत्पन्न नहीं हुआ। इसमें यह सूत्र प्रमाण है— न श्रवणमात्रात् तत्सिद्धिरनादिवासनाया बल- वत्वात् ॥ ३ ॥ अर्थ—मुक्ति श्रवणमात्र से भी नहीं हो सकती । यद्यपि श्रवण भी बहुत जन्मों के पुण्यों से होता है तथापि श्रवणमात्र से वैराग्य की सिद्धि भी नहीं होती है, किन्तु विवेक के साक्षात्कार से मुक्ति होती है और साक्षात्कार शीघ्र नहीं होता । अनादि मिथ्यावासना के बलवान् होने से और उस वासना के रहते हुए पुरुष मुक्त नहीं हो सकता, किन्तु योग से जो विवेक साक्षात्कार होता है। उसके ही द्वारा मुक्त होता है और इस योग में सैकड़ों विघ्न पैदा हो जाते हैं। इस कारण यह योग भी बहुत जन्मों में सिद्ध होता है। इस कारण जन्मान्तर में वैराग्य को प्राप्त होकर किसी समय में कोई-कोई पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं, किन्तु सब मोक्ष को नहीं प्राप्त होते। प्र०—सृष्टि का प्रवाह (जन्म, मरण आदि) किस तरह चल रहा है ?
( ७१ ) उ०—बहुभृत्यवद्वा प्रत्येकम् ॥ ४ ॥ अर्थ—जैसे एक गृहस्थ से सैकड़ों नौकर बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष आदि का क्रम से भरण-पोषण ( भोजन, वस्त्र आदि ) होता है, इसी प्रकार प्रकृति के सत्त्वादि गुण प्रत्येक सैकड़ों पुरुषों को क्रम से मुक्त कर देते हैं, इसवास्ते कोई-कोई मुक्त हो भी जाते हैं; लेकिन और जो बाक़ी मनुष्य हैं उनकी मुक्ति के वास्ते सृष्टिप्रवाह की आवश्यकता है, क्योंकि पुरुष अनन्त है । प्र०—प्रकृति सृष्टि की कारण है, इसमें क्या हेतु है ? क्योंकि पुरुष को ही कारण सब मानते हैं ? उ०—प्रकृतिवास्तवे च पुरुषस्याध्याससिद्धिः॥५ अर्थ—यद्यपि वास्तव में ( निस्सन्देह ) प्रकृति ही सृष्टि का कारण है तथापि ( तौ भी ) सृष्टि के करने में पुरुष की अध्यास सिद्धि है । प्र०—अध्यास किसको कहते हैं ? उ०—अध्यास उसे कहते हैं कि काम दूसरा करे और नाम दूसरे का हो, जैसे कि—लड़ाई में योद्धा ( वीर लोग ) अपनी शक्ति से जीत और हार करते हैं; लेकिन वह जीत-हार सब राजा ही की गिनी जाती है. इसको ही अध्यास कहते हैं । प्र०—वास्तव में प्रकृति ही सृष्टि करनेवाली कैसे है ? क्योंकि सृष्टि को अनित्य शास्त्रों ने प्रतिपादन ( सबूत ) किया है । यदि ऐसा है तो उस सृष्टि का कारण, जो प्रकृति है, वह भी अनित्य होगी ? उ०—कार्यतस्तत्सिद्धेः ॥ ६ ॥ अर्थ—कार्यों के देखने ही से प्रकृति के वास्तव कारणत्व ( कारण होने ) की सिद्धि हो सकती है, क्योंकि यह सृष्टिरूपी
( ७२ ) कार्य प्रकृति के सिवाय और किसका हो सकता है ? यदि पुरुष का कहें तो पुरुष में परिणामित्व की प्राप्ति आती है, और यदि प्रकृति कान कहें तो किसका—यह सन्देह पैदा होता है ? इस कारण प्रकृति ही को वास्तव में कारणत्व है और जो सृष्टि के अनित्यत्व में स्वप्न का दृष्टान्त देते हैं, सो भी ठीक नहीं ; क्योंकि स्वप्न भी अपनी अवस्था में सत्य ही होता है। इस कारण सृष्टि नित्य है, और उसका कारण भी नित्य है । प्र०—प्रकृति अपने मोक्ष के वास्ते सृष्टि करने में क्यों तैयार होती है ? उ०—चेतनोद्देशान्नियमः कण्टकमोक्षवत् ॥ ७ ॥ अर्थ—विवेकी पुरुष के लिए प्रकृति का यह नियम है कि वह प्रक्रित विवेकी पुरुष के द्वारा अपना मोक्ष करे, जैसे— ज्ञानवान् पुरुष बड़ी बुद्धिमानी के साथ काँटे से काँटे को निकालता है, उसका ही सहारा और अज्ञानी मनुष्य भी लेते हैं ; इस तरह से प्रकृति को भी जानना चाहिये । प्र०—पुरुष में कारणत्व का होना गिनने ही मात्र कहा है सो ठीक नहीं है, क्योंकि प्रकृति के मेल से पुरुष भी महदादिकों के परिणाम को धारण कर लेता है, जैसे—काठ जमीन के ही समान हो जाता है, उसी तरह पुरुष को भी होना चाहिये ? उ०—अन्ययोगेऽपितत्सिद्धिर्नाञ्जस्ये नायोदा- हवत् ॥ ८ ॥ अर्थ—प्रकृति के साथ पुरुष का योग होने पर भी पुरुष वास्तव में सृष्टि का कारण नहीं हो सकता, यह प्रत्यक्ष ही है, जैसे— लोहे और अग्नि के संयोग होने पर लोहा अग्नि नहीं हो सकता । यद्यपि इस दृष्टांत से दोनों में परिणामित्व हो सकता