भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ३ ) हेतु' अर्थात् दुःख के उत्पन्न होने का कारण 'हानोपाय' अर्थात् दुःख के नाश करने का उपाय । प्र०—क्या दुःख अन्न और औषध इत्यादि से दूर नहीं होता ? उ०—दुःख की अत्यन्त निवृत्ति किसी प्राकृतिक वस्तु से नहीं हो सकती, जैसाकि लिखा है— न दृष्टात् दृष्टात्तत्सिद्धिर्निवृत्तेऽप्यनुवृत्ति दर्शनात् ॥ २ ॥ अर्थ—दृश्य पदार्थों अर्थात् औषध्यादि द्वारा दुःख का अत्यन्ताभाव हो जाना सम्भव नहीं, क्योंकि जिस पदार्थ के संयोग से दुःख दूर होता है, उसके वियोग से वही दुःख फिर उपस्थित हो जाता है, जैसे—अग्नि के निकट बैठने या कपड़े के संसर्ग से शीत दूर होता है और अग्नि या कपड़े के अलग होने से फिर वही शीत उपस्थित हो जाता है, अतएव दृश्य पदार्थ अनागत् दुःख की औषध नहीं । प्र०—क्या दृश्य पदार्थ दुःख की अत्यन्त निवृत्ति का कारण नहीं ? उ०—नहीं । प्र०—प्रात्यहिकक्षुत्प्रतीकारवत् तत्प्रतीकारचे- ष्टनात् पुरुषार्थत्वम् ॥ ३ ॥ अर्थ—नित्यप्रति क्षुधा लगती है उसकी निवृत्ति भोजन से हो जाती है । इसी प्रकार और दुःख भी प्राकृतिक वस्तुओं से दूर हो सकते हैं अर्थात् जैसे औषध से रोग की निवृत्ति हो जाती है, अतएव वर्त्तमान काल के दुःख दृष्ट पदार्थों से दूर हो जाते हैं, इसीको पुरुषार्थ मानना चाहिये ।

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