सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४ ) उ०—सर्वासम्भवात् सम्भवेऽपि सत्वारसम्भ- वाद्धेयः प्रमाण कुशलैः ॥ ४ ॥ अर्थ—प्रथम तो प्रत्येक दुःख दृष्ट पदार्थों से दूर ही नहीं होता, क्योंकि सर्व वस्तु प्रत्येक देश और काल में प्राप्त नहीं हो सकती। यदि मान भी लें कि प्रत्येक आवश्यकीय वस्तुएँ सुलभ भी हों तथापि उन पदार्थों से दुःख का अभाव नहीं हो सकता, केवल दुःख का तिरोभाव कुछ काल के लिये हो जायगा ; अतएव बुद्धिमान को चाहिये कि दृष्ट पदार्थों से दुःख दूर करने का प्रयत्न न करे, दुःख के मूलोच्छेद करने का प्रयत्न करें, जैसाकि लिखा है— उत्कर्षादपिमोक्षस्य सर्वोत्कर्षश्रुतेः ॥ ५ ॥ अर्थ—मोक्ष सब सुखों से परे है और प्रत्येक बुद्धिमान् सबसे परे पदार्थ की ही इच्छा करता है। इस हेतु से दृष्ट पदार्थों को छोड़कर मोक्ष के लिये प्रयत्न करें, यही प्राणियों का मुख्य उद्देश्य है। अविशेषश्चोभयोः ॥ ६ ॥ अर्थ—यदि मोक्ष को अन्य सुखों के समान माना जावे तो दोनों बातें समान हो जावेंगी, परन्तु क्षणिक सुख को महाकल्प -पर्य्यन्त सुख के समान समझना बड़ी मूर्खता है। प्र०—तुम जो मोक्ष को सबसे उत्तम जानते हो और मोक्ष छूटने को कहते हैं, छूटता वही है, जो बन्धन में हो। क्या यह जीव बन्धन में है ? यदि कहो कि बन्धन में है तो वह बन्धन उसका स्वाभाविक गुण है या नैमित्तिक ? उ०—न स्वभावतोबद्धस्य मोक्ष साधनोपदेश विधिः ॥ ७ ॥