भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ५ ) अर्थ—दुःख जीव का स्वाभाविक गुण नहीं, क्योंकि जो गुण स्वभाव से होता है, वह गुणी से अलग नहीं होता, अतएव दुःख के नाश के कथन से ही प्रतीत होता है, कि दुःख जीव का स्वाभाविक गुण नहीं, क्योंकि वह गुणी से हो ही नहीं सकता। स्वभावस्यानपायित्वादननुष्ठानलक्षणम प्रामा- ण्यम् ॥ ८ ॥ अर्थ—स्वाभाविक गुण के अविनाशी होने से जिन मन्त्रों में दुःख दूर करने का उपदेश किया गया है, वह सब प्रमाण नहीं रहेंगे, अतएव दुःख जीव का स्वाभाविक गुण नहीं है। नाशक्योपदेशविधिरुपदिष्टेऽप्यनुपदेशः ॥ ६ ॥ अर्थ—निष्फल कर्म्म के निमित्त वेद में कभी उपदेश नहीं होसकता, क्योंकि असम्भव के लिये उपदेश करना भी न करने के समान है, अतएव दुःख जीव का स्वाभाविक गुण नहीं, किन्तु नैमित्तिक है। प्र०—शुक्लपटवद्बीजवच्चेत् ॥ १० ॥ अर्थ—स्वाभाविक गुण का भी नाश होजाता है, जैसे—श्वेत वस्त्र का श्वेत रंग स्वाभाविक गुण है, परन्तु वह मैला सुर्ख हो जाने से नष्ट होजाता है। इसी प्रकार बीज में अंकुर लाने का स्वाभाविक गुण है, परन्तु वह बीज के जला देने से नष्ट हो जाता है, अतएव यह विचार करना ठीक नहीं। उ०—शक्त्युद्भवानुद्भवाभ्यां नाशक्योपदेशः॥११॥ अर्थ—उपर्यु क्त उदाहरण स्वाभाविक गुण के अत्यन्ताभाव का सर्वथा अयुक्त व अप्रामाणिक है; क्योंकि यह तो शक्ति के गुप्त व प्रकट होने का उदाहरण है; क्योंकि यदि रजक के धोने से