भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 192 में से

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( ७६ ) प्र०—"अग्निःवागप्येति वातं प्राणः ।" अग्नि में वाणी लय होती है, और पवन में प्राण लय होता है। जबकि अग्नि इत्यादि श्रुतियाँ कहती हैं कि अग्नि में वाणी लय होजाती है और वायु में प्राण लय होजाता है, तो उत्पत्ति भी इन से ही क्यों न मानी जाय ? उ०—देवतालयश्रुतिर्नारम्भकस्य ॥ २१ ॥ अर्थ—अग्नि आदि श्रेष्ठ गुण से युक्त पदार्थों में लय दीखता है, लेकिन उत्पत्ति नहीं दीखती और यह कोई नियम भी नहीं है; कि जो जिसमें लय हो वह उससे ही उत्पन्न भी हो, जैसे—जल की बूँद पृथिवी में लय होजाती है, लेकिन उससे उत्पन्न नहीं होती। इस कारण इन्द्रियों की उत्पत्ति अहङ्कार ही से है, किन्तु पंचभूतों से नहीं है। प्र०—इन्द्रियों से सम्बन्ध रखने वाला मन नित्य है व अनित्य ? उ०—तदुत्पत्तिश्रुतेर्विनाशदर्शनाच्च ॥२२॥ अर्थ—नित्य नहीं है, किन्तु अनित्य है, क्योंकि "एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च" इससे ही सब इन्द्रियाँ और मन पैदा होते हैं, इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध है कि मन का नाश भी देखने में आता है, क्योंकि बुढ़ापे में चक्षु (तेज) आदि इन्द्रियों की तरह नाश भी होता है। इससे मन नित्य नहीं है। प्र०—नासिका आदि इन्द्रियों के गोलक (चिह्नों) को ही इन्द्रिय माना है ? उ०—अतीन्द्रियमिन्द्रियं भ्रान्तानामधिष्ठाने।२३ अर्थ—हाँ ! भ्रान्त मनुष्यों की बुद्धि ने गोलक का नाम इन्द्रिय माना है, लेकिन इन्द्रियाँ तो अतीन्द्रिय हैं, अर्थात् इन्द्रियों से इन्द्रियों का ज्ञान नहीं होता।

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