सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ७७ ) प्र०-इन्द्रिय एक ही है, उसकी ही अनेक शक्तियाँ अनेक विलक्षण काम करती रहती हैं ? उ०—शक्तिभेदेऽपि भेदसिद्धौ नैकत्वम् ॥२४॥ अर्थ—एक इन्द्रिय की भी अनेक शक्तियों के मानने से इन्द्रियों का भेद सिद्ध हो गया, क्योंकि उन शक्तियों में ही इन्द्रियत्व का स्थापन हो सकता है । प्र०-एक अहङ्कार से अनेक प्रकार की इन्द्रियों की उत्पत्ति होना यह बात तो न्याय से विरुद्ध है, क्योंकि एक वस्तु से एक ही वस्तु उत्पन्न होनी चाहिये ? उ०-न कल्पनाविरोधः प्रमाणदृष्टस्य ॥ २५ ॥ अर्थ-जो वस्तु प्रमाण ही से सिद्ध है, उसके विरुद्ध कल्पना करना न्याय से विरुद्ध है, क्योंकि महदादिकों में जो गुण दीखते हैं वे महदादिकों के कार्यों में भी दीखते हैं । इस प्रकार प्रत्यक्षादि प्रमाणों से जो सिद्ध है वह न्याय से विरुद्ध नहीं हो सकता । कारण वास्तव में तो मन एक ही है, लेकिन उस कारण की शक्तियों के भेद से दस इन्द्रियाँ अपने-अपने कार्य के करने में तत्पर ( लगी ) रहती हैं और इस ही बात को अगला सूत्र भी पुष्ट करता है । उभयात्मकं मनः ॥ २६ ॥ अर्थ—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ-इन दशों इन्द्रियों से मन का सम्बन्ध है, अर्थात् मन के बिना कोई भी इन्द्रिय अपने किसी काम के करने में नहीं लग सकती । अब इस कहे हुए सूत्र का अर्थ इस सूत्र में विस्तार से कहते हैं । गुणपरिणामभेदान्नानात्वमवस्थावत् ॥ २७ ॥ अर्थ—गुणों के परिणाम भेद से एक मन की अनेक शक्तियाँ इस तरह होती हैं, जैसे-मनुष्य जैसी सङ्गति में बैठेगा उसके