सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ७६ ) सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पंच ॥३१ अर्थ—प्राण वायु आदि को लेकर समान पर्यन्त जो पाँच वायु हैं यह अन्तःकरण की साधारण वृत्ति कहलाते हैं, अर्थात् - जो वायु हृदय में रहता है, उसका नाम प्राण है ; और जो गुदा में रहता है, उसका नाम अपान है ; और जो कण्ठ में रहता है, उसका नाम उदान है ; जो नाभि में रहता है, उसका नाम समान है ; और जो सारे शरीर में रहता है, उसका नाम व्यान-वायु है—यह सब अन्तःकरण के परिणामी भेद हैं, और जो बहुत-से प्राण और वायु को एक मानते हैं, उनका मानना इस सबब से अयोग्य है कि “एतस्माज्जायते प्राणः मनःसर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापश्च पृथिवी विश्वस्य धारिणी” । इस में प्राण और वायु को भिन्न-भिन्न माना है । अब आचार्य अपने सिद्धान्त को प्रकाश करते हैं, कि जैसे कई पुरुष इन्द्रियों की वृत्ति क्रम से ( एक समय में एक ही इन्द्रिय काम करेगी ) मानते हैं, उसको अयुक्त सिद्ध करते हैं । क्रमशोऽक्रमशश्चेन्द्रियवृत्तिः ॥ ३२ ॥ अर्थ—इन्द्रियों की वृत्ति क्रम से भी होती है और बिना क्रम के भी होती है, क्योंकि संसार में दीखता है कि एक आदमी जब पानी पीने में तत्पर होता है, तब वह देखता भी है । प्र०-क्या न्याय ने जो एक ही इन्द्रिय के विषय का ज्ञान होना लिखा है, वह ठीक नहीं ? उ०—एक काल में दो ज्ञानेन्द्रियां काम नहीं करतीं, परन्तु एक कर्मेन्द्रिय और एक ज्ञानेन्द्रि साथ-साथ काम कर सकती हैं। मन की वृत्तियां ही संसार का निदान है, अर्थात् जन्म मरण आदि सब मन की वृत्तियों से ही होते हैं, इसको ही कहते भी हैं—