भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ८० ) वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥ ३३ ॥ अर्थ—प्रमाण ( प्रत्यक्ष आदि ), विपर्यय ( झूठा ज्ञान ), विकल्प ( सन्देह ), नींद, स्मृति ( याद होना ) ; यह पाँच मन की वृत्तियाँ हैं, और इनसे ही सुख-दुःख उत्पन्न होता है । जब मन की वृत्तियाँ निवृत्त होजाती हैं तब पुरुष के स्वरूप में स्थित होजाती हैं । इस बात को इस आगे के सूत्र से सिद्ध करते हैं । तन्निवृत्तावुपशान्तोपरागःस्वस्थः ॥ ३४ ॥ अर्थ—मन की वृत्तियों के निवृत्त होने पर पुरुष का उपराग शान्त हो जाता है, और पुरुष स्वस्थ हो जाता है । यही बात योग सूत्र में भी कही गई है, कि जब चित्त की वृत्तियों का निरोध हो जाता है तब पुरुष अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है । पुरुष का स्वस्थ होना यही है, कि उसके उपाधिरूप प्रतिबिम्ब का निवृत्त हो जाना, इसको ही दृष्टान्त से भी सिद्ध करते हैं । कुसुमवच्चमणिः ॥ ३५ ॥ अर्थ—जैसे स्फटिक मणि में काले, पीले इत्यादि फूलों की परछाईं पड़ने से काले, पीले रङ्ग वाली वह स्फटिक मणि मालूम पड़ने लगती है, और जब उन काले, पीले फूलों को मणि के साथ से भिन्न कर देते हैं तब वह मणि स्वच्छ प्रत्यक्ष रह जाती है । इस ही तरह मन की वृत्तियों के दूर होने पर पुरुष राग रहित और स्वस्थ हो जाता है । प्र०—यह इन्द्रियाँ किसके प्रयत्न से अपने-अपने कार्यों के करने में लगी रहती हैं, क्योंकि पुरुष तो निर्विकार है और ईश्वर से इन्द्रियों का कोई भी सम्बन्ध नहीं है ? उ०—पुरुषार्थं करणोद्भवोऽप्यदृष्टोल्लासात् ।३६