सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८१ ) अर्थ—पुरुष के वास्ते इन्द्रियों की प्रवृत्ति भी उसी कर्म के वश से है, जो पहिले प्रकृति को कह आये हैं, और इसका दृष्टान्त भी ३५ वें सूत्र में दे चुके हैं, कि संयोग से जैसे एक का गुण दूसरे में मालूम होता है, उसी प्रकार प्रकृति का कर्म पुरुष संयोग से है, वही इन्द्रियों की प्रवृत्ति में हेतु है। इस सूत्र में 'अपि' शब्द से पूर्व कही हुई प्रकृति की याद दिलाकर पुरुष को कर्म से कुछ अंश में युक्त किया है, और फिर भी इसी पक्ष को पुष्ट करने के वास्ते दृष्टान्त देंगे। दूसरे के वास्ते भी अपने आप प्रवृत्ति होती है, इसमें दृष्टान्त भी देते हैं। धेनु वद्वत्साय ॥ ३७ ॥ अर्थ—जैसेकि बछड़े के वास्ते गौ स्वयं (आप ही) दूध उतार देती है, दूसरे की कुछ भी आवश्यकता नहीं रखती। इसी प्रकार अपने स्वामी (पुरुष) के वास्ते इन्द्रियों की प्रवृत्ति स्वयं होती है। प्र०—भीतर और बाहर की सब इन्द्रियाँ कितनी हैं ? उ०—करणं त्रयोदशविधमवान्तरभेदात् ॥३८ अर्थ—अवान्तर-भेद से इन्द्रियाँ तेरह तरह की हैं—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, एक बुद्धि, मन, और अहङ्कार, इन भेदों के होने से। प्र०—अवान्तर कहने का क्या प्रयोजन (मतलब) है ? उ०—मन सब इन्द्रियों से मुख्य है। प्र०—पुरुष के वास्ते इन्द्रियों की प्रवृत्ति में केवल मन ही मुख्य है, और सब इन्द्रियाँ गौण हैं, तो बुद्धि में वो कौन-सा मुख्य धर्म है ?